वामपंथी Lula da Silva चौथी बार राष्ट्रपति बने, ट्रंप को लगा झटका
ब्रासीलिया। ब्राजील में वामपंथी नेता लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने राष्ट्रपति चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए देश के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है। 80 वर्षीय लूला चौथी बार ब्राजील के राष्ट्रपति बनेंगे, जो उनकी प्रभावशाली राजनीतिक यात्रा का एक और अध्याय है। इस चुनाव में सबसे खास बात यह रही कि यह ब्राजील के चुनावी इतिहास में पहली बार हुआ है जब पहले दौर में पिछड़ने वाला उम्मीदवार दूसरे दौर के मतदान में निर्णायक जीत हासिल करने में सफल रहा हो। लूला ने अपने प्रतिद्वंद्वी दक्षिणपंथी फ्लावियो बोल्सोनारो को शिकस्त दी, जिससे अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी एक बड़ा झटका लगा है, जो बोल्सोनारो का मुखर समर्थन कर रहे थे।
चुनाव के दूसरे और अंतिम दौर में लूला दा सिल्वा को 51.78 प्रतिशत वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी फ्लावियो बोल्सोनारो 48.22 प्रतिशत वोटों के साथ पीछे रह गए। इस तरह लूला ने करीब दो प्रतिशत वोटों के करीबी अंतर से जीत दर्ज की। चार अक्टूबर को हुए पहले दौर के मतदान में बोल्सोनारो ने बढ़त बनाई थी, जिसे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बहुत बड़ी जीत करार दिया था। हालांकि, दूसरे दौर में लूला ने शानदार वापसी करते हुए सभी अनुमानों को गलत साबित किया और ऐतिहासिक अंतर को पाटकर जीत हासिल की। फ्लावियो बोल्सोनारो पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं, जो 2022 का चुनाव हारने के बाद तख्तापलट की साजिश रचने के आरोप में 27 साल की जेल की सजा काट रहे हैं। खराब स्वास्थ्य के कारण जायर बोल्सोनारो फिलहाल घर में नजरबंद हैं। फ्लावियो ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान अपने पिता को रिहा कराने का वादा किया था, लेकिन इस चुनावी हार से उनकी इस उम्मीद पर भी पानी फिर गया है।
लूला ने अपने अभियान में ब्राजील की संप्रभुता पर जोर दिया और मतदाताओं से उस नेता को चुनने का आग्रह किया जिसने ब्राजील के झंडे को चूमा, न कि उसे जिसने अमेरिकी झंडे को चूमा। उन्होंने अमेरिका पर ब्राजील के चुनाव में हस्तक्षेप करने का आरोप भी लगाया था, जिसे वाशिंगटन ने निराधार बताया था। पहले दौर के मतदान में लगभग 3.3 करोड़ लोगों के वोट न डालने के बाद, लूला के समर्थकों ने दूसरे दौर के लिए बड़े पैमाने पर रैलियां आयोजित की थीं ताकि मतदान प्रतिशत बढ़ाया जा सके। लूला की यह जीत ब्राजील की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत देती है, जहां अनुभवी नेतृत्व और वामपंथी विचारधारा फिर से केंद्र में आ गई है।
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