Pakistan ने फिर छेड़ा कश्मीर और सिंधु जल का मुद्दा
इस्लामाबाद। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की राजकीय यात्रा के दौरान पाकिस्तान ने एक बार फिर कूटनीतिक शिष्टाचार को दरकिनार करते हुए कश्मीर और सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मुइज्जू के तीन दिवसीय दौरे के समय हुई द्विपक्षीय बातचीत में कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुसार सुलझाने की पुरानी बातें दोहराईं। भारत का इस पर हमेशा से स्पष्ट रुख रहा है कि 1972 के शिमला समझौते के तहत कश्मीर एक द्विपक्षीय मुद्दा है और इसमें किसी तीसरे पक्ष या अंतरराष्ट्रीय मंच की कोई भूमिका नहीं हो सकती। बातचीत के दौरान शहबाज शरीफ ने भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित किए जाने के निर्णय पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने मालदीव के राष्ट्रपति के सामने अपनी शिकायत रखते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सम्मान किया जाना चाहिए और साझा जल संसाधनों को हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
शरीफ ने यह धमकी भी दी कि पाकिस्तान इस संधि के किसी भी उल्लंघन को युद्ध की कार्रवाई मानेगा। ज्ञात हो कि एक बर्बर आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था। भारत ने साफ कर दिया है कि जब तक सीमा पार से आतंकवाद पूरी तरह बंद नहीं होता, तब तक यह संधि बहाल नहीं की जाएगी और खून तथा पानी एक साथ नहीं बह सकते। इससे पहले हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने फैसला सुनाया था कि भारत का संधि को निलंबित करने का कदम मान्य नहीं है।
हालांकि, भारत सरकार ने इस फैसले को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि उक्त ट्रिब्यूनल के पास भारत के संप्रभु निर्णयों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। भारत ने पाकिस्तान की ओर जाने वाले अतिरिक्त पानी को रोकने और अपनी जलविद्युत परियोजनाओं पर काम तेज करने की रणनीति बनाई है। उल्लेखनीय है कि 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इसमें पूर्व की तीन नदियों व्यास, रावी और सतलुज का नियंत्रण भारत को तथा पश्चिम की तीन नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब का नियंत्रण अधिकांशतः पाकिस्तान को सौंपा गया था।
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