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Hormuz स्ट्रेट विवाद सुलझने के आसार, खत्म होगा पश्चिम एशिया का संकट

Hormuz स्ट्रेट विवाद सुलझने के आसार, खत्म होगा पश्चिम एशिया का संकट

तेहरान। पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव अब सुलझने की कगार पर पहुंच गया है। अमेरिका और इजरायल के साथ जारी गतिरोध के बीच अब ईरान ने भी शांति समझौते को लेकर बेहद सकारात्मक संकेत दिए हैं। तेहरान की ओर से स्पष्ट किया गया है कि वह वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट को फिर से पूरी तरह खोलने के लिए तैयार है। हालांकि, स्थिति को पूरी तरह से युद्ध-पूर्व के सामान्य स्तर पर लाने में करीब एक महीने यानी 30 दिनों का समय लग सकता है। इस संभावित शांति समझौते के तहत दोनों पक्षों के बीच 60 दिनों के युद्धविराम विस्तार पर सहमति बनने की चर्चा है। इस अवधि के दौरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही को पूरी तरह सुरक्षित और टैक्स-मुक्त रखा जाएगा, जैसा कि तनाव शुरू होने से पहले था। ईरान की ओर से यह प्रस्ताव भी रखा गया है कि जैसे ही अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट के बाहर से अपनी नाकेबंदी हटाएगा, वैसे ही ईरान भी इस मार्ग को पूरी तरह सक्रिय कर देगा। इसके अलावा, ईरान इस समुद्री मार्ग में बिछाई गई बारूदी माइन्स को हटाने में भी सहयोग करने के लिए राजी हो गया है। इसके बदले में अमेरिका ईरान को कुछ आर्थिक प्रतिबंधों से छूट दे सकता है, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में फिर से अपना कच्चा तेल बेच सके।

वैश्विक स्तर पर इस समझौते को लेकर हलचल तेज है। भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने नई दिल्ली में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ मीडिया से बात करते हुए संकेत दिए कि ईरान के साथ बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है और आने वाले कुछ ही घंटों में दुनिया को एक बड़ी खुशखबरी मिल सकती है। हालांकि, इसके साथ ही अमेरिका ने अपना पुराना रुख भी स्पष्ट रखा है कि किसी भी समझौते की स्थिति में ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस शांति समझौते के मुख्य मसौदे के तहत अमेरिका और उसके सहयोगी देश तेहरान को यह भरोसा देंगे कि वे उस पर हमला नहीं करेंगे। बदले में ईरान भी अमेरिकी सहयोगियों की सुरक्षा को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा। वर्तमान में इस प्रस्तावित समझौते की समीक्षा ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद द्वारा की जा रही है। वहां से मंजूरी मिलने के बाद इसे अंतिम मुहर के लिए सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह मुजतबा खामेनेई के पास भेजा जाएगा। यदि दोनों पक्षों में अंतिम सहमति बनती है, तो यह पश्चिम एशिया सहित पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

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