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द्वितीय विश्व युद्ध में लापता हुई Japanese पनडुब्बी में छिपा है कीमती खजाना

द्वितीय विश्व युद्ध में लापता हुई Japanese पनडुब्बी में छिपा है कीमती खजाना

  • अटलांटिक महासागर की करीब 17 हजार फीट गहराई में मिला मलबा 

टोक्यो। द्वितीय विश्व युद्ध के सबसे रहस्यमयी समुद्री अभियानों में शामिल जापानी पनडुब्बी आई-52 का रहस्य कई दशकों बाद तब खुला, जब 1995 में अटलांटिक महासागर की करीब 17 हजार फीट गहराई में उसका मलबा खोजा। 1944 में रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हुई यह पनडुब्बी लंबे समय तक इतिहासकारों, नौसैनिक विशेषज्ञों और खोजकर्ताओं के लिए पहेली बनी हुई थी। इसकी खोज ने न केवल युद्धकालीन घटनाओं पर नई रोशनी डाली, बल्कि यह भी सामने आया कि पनडुब्बी अपने साथ भारी मात्रा में सोना और अन्य बहुमूल्य सैन्य सामग्री ले जा रही थी। 


जापान ने अपनी अत्याधुनिक ट्रांसपोर्ट पनडुब्बी आई-52 को एक ऐसे गुप्त मिशन पर भेजा, जिसके पेट में दो टन शुद्ध सोना छिपा था। यह महाखजाना आज भी इतिहास प्रेमियों और खजाने के खोजियों की कल्पनाओं को रोमांचित करता है। जापान को उस समय युद्ध में बढ़त हासिल करने के लिए जर्मनी की उन्नत सैन्य तकनीक, विशेष रूप से रडार और औद्योगिक मशीनरी की सख्त ज़रूरत थी। हिटलर ने जापान को यह तकनीक उपलब्ध कराने के बदले में भारी कीमत वसूली। इस सौदे के तहत, आई-52 पनडुब्बी में लगभग दो टन शुद्ध सोना लादा गया। सोने के अलावा, पनडुब्बी में टन के हिसाब से रबर, टिन, कुनैन और अफीम जैसी कई रणनीतिक युद्ध सामग्रियां भी भरी गई थीं।


जानकारी के मुताबिक द्वितीय विश्व युद्ध में जापान और जर्मनी के बीच समुद्री मार्ग से सामान पहुंचाना जोखिम भरा था। मित्र राष्ट्रों की नौसेना के कड़े पहरे के कारण सामान्य व्यापारी जहाजों का सुरक्षित पहुंचना लगभग असंभव था। ऐसे में दोनों देशों ने लंबी दूरी तय करने वाली विशेष परिवहन पनडुब्बियों का सहारा लिया। आई-52 भी ऐसी ही एक पनडुब्बी थी, जिसे जापान से जर्मनी तक अहम सैन्य सामग्री पहुंचाने का जिम्मा सौंपा गया था। यात्रा के दौरान पनडुब्बी ने सिंगापुर में रुककर अपना माल लादा। इसमें टिन, टंगस्टन, मोलिब्डेनम जैसी रणनीतिक धातुएं, प्राकृतिक रबर, कुनैन और अफीम जैसी दवाइयों के अलावा सबसे मूल्यवान सामान के रूप में 146 सोने की छड़ें रखी गई थीं। यह पूरा मिशन अत्यंत गोपनीय था, लेकिन ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने जापानी और जर्मन नौसेना के गुप्त संदेशों को डिकोड कर लिया था। इससे मित्र राष्ट्रों को पनडुब्बी के मार्ग और उसके मिशन की पूरी जानकारी मिल गई। 


रिपोर्ट के मुताबिक 23 जून 1944 की रात अटलांटिक महासागर में आई-52 जर्मन पनडुब्बी यू-530 से मिलने के लिए समुद्र की सतह पर आई। इसी दौरान अमेरिकी नौसेना ने उस पर हमला कर दिया। हमले के बाद पनडुब्बी समुद्र में समा गई। अगले दिन समुद्र की सतह पर मलबा और रबर के बंडल तैरते मिले, जबकि पनडुब्बी में सवार सभी 109 नौसैनिकों की मौत हो चुकी थी। युद्ध के बाद यह माना जाता रहा कि पनडुब्बी डूब चुकी है, लेकिन उसकी सही स्थिति का पता किसी को नहीं था। 1990 के दशक की शुरुआत में शोधकर्ता पॉल टिडवेल ने कई देशों के अभिलेखागार, नौसैनिक दस्तावेजों, डायरी और युद्ध रिपोर्टों का विस्तृत अध्ययन किया। समुद्री धाराओं, मौसम और पुराने नौवहन आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद खोजकर्ताओं ने संभावित स्थान का नया अनुमान लगाया। इसके बाद 1995 में गहरे समुद्र में विशेष अभियान चलाया गया। कई सप्ताह की खोज के बाद दो मई 1995 को सोनार प्रणाली पर एक बड़ा ढांचा दिखाई दिया। रिमोट कैमरों से पुष्टि हुई कि यह वही जापानी पनडुब्बी आई-52 थी। अभियान के दौरान मलबे के कुछ हिस्से तो निकाले गए, लेकिन सोने की छड़ों को नहीं छुआ गया। माना जाता है कि पनडुब्बी के अगले हिस्से में रखा सोना अब भी समुद्र की गहराइयों में सुरक्षित है। आज आई-52 केवल एक खोए हुए खजाने की कहानी नहीं, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध, खुफिया अभियानों और समुद्री इतिहास के सबसे चर्चित रहस्यों में से एक है।

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