Pakistan का सैन्य तख्तापलट: क्या 1971 जैसे बन रहे हालात?
इस्लामाबाद। इस वक्त पाकिस्तान चौतरफा घिरा हुआ है। अफगानिस्तान से जहां पंगा चल रहा है वही बलूच भी पाकिस्तान पर हमलावर हैं। उनकी अपनी मांगे है और वे निरंतर अपने हक के लिए लड़ रहे हैं। इसके अलावा पाकिस्तान के अपने आतंरिक मामले हैं। महंगाई और गरीबी, भुखमरी ने आम आदमी को गुस्से में खड़ा कर दिया है। आतंकवाद और सेना के साथ शहबाज सरकार की पटरी नहीं बैठ पाने की खबरें भी चल पड़ी हैं। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या पाकिस्तान में 1971 जैसे हालात बनने लगे हैं?20 दिसंबर 1971 को, बांग्लादेश के पाकिस्तान से अलग होने के मात्र चार दिन बाद, तात्कालिक राष्ट्रपति याह्या खान ने सैन्य दबाव में इस्तीफा दे दिया। 1971 के युद्ध में मिली करारी हार के बाद पाकिस्तानी सेना राजनीति से कुछ दूर हटी थी, और ऐसे में प्रमुख राजनेता जुल्फिकार अली भुट्टो ने देश की बागडोर संभाली। उन्होंने राष्ट्रपति पद ग्रहण कर एक नई सरकार के गठन और देश को स्थिरता प्रदान करने का बीड़ा उठाया।
भुट्टो ने एक नए पाकिस्तान, नए संविधान और नई व्यवस्था का वादा किया, जिससे समाज के विभिन्न वर्गों को उम्मीद मिली। साल 1973 में, उनके और उनके सहयोगियों द्वारा तैयार किया गया नया संविधान अपनाया गया, जिसने संसदीय शासन प्रणाली को बहाल किया। भुट्टो राष्ट्रपति पद छोड़कर अधिक शक्तिशाली प्रधानमंत्री बन गए, क्योंकि वे राष्ट्रपति पद को केवल औपचारिक मानते थे। लेकिन, प्रधानमंत्री बनते ही भुट्टो की सत्ता लोलुपता बढ़ती गई।उन्होंने ‘फेडरल सिक्योरिटी फोर्स’ का गठन किया, जिसका काम उनकी सुरक्षा करना था, लेकिन यह जल्द ही एक अर्धसैनिक बल बन गया, जिसका उपयोग विरोधियों को दबाने के लिए किया जाने लगा। उनकी अपनी पार्टी पीपीपी में भी दरारें आने लगीं, और आरोप लगे कि भुट्टो ने अपने करीबी सहयोगियों को भी चुप कराकर जेल में डालना शुरू कर दिया। युवा पीढ़ी और छात्र भी कार्रवाइयों का शिकार हुए, जिससे अक्सर विश्वविद्यालयों का कामकाज ठप हो जाता था।1977 में भुट्टो ने दूसरा राष्ट्रीय चुनाव कराने का फैसला किया। नौ विपक्षी दलों ने मिलकर पाकिस्तान नेशनल एलायंस (पीएनए) बनाया और भुट्टो की पीपीपी को चुनौती दी। एफएसएफ के इस्तेमाल और धांधली के आरोपों के बावजूद, पीएनए ने भुट्टो पर अपने हमले तेज किए, धार्मिक मंच का सहारा लेते हुए इस्लामी सिद्धांतों पर लौटने का आह्वान किया। भुट्टो की पार्टी ने बहुमत से चुनाव जीता, लेकिन बड़े पैमाने पर धांधली के आरोपों और हिंसक प्रदर्शनों ने देश को अशांत कर दिया। यह जीत एक खोखली साबित हुई।
स्थिति का लाभ उठाते हुए, 5 जुलाई 1977 को तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल मोहम्मद जिया-उल-हक, जिसे खुद भुट्टो ने चुना था, ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। चुनाव परिणामों को खारिज करते हुए भुट्टो को घर में नजरबंद कर दिया गया और सरकार भंग कर दी गई। जिया-उल-हक ने शुरुआत में नए चुनाव का वादा किया, लेकिन उनका इरादा भुट्टो को दोबारा सत्ता में लौटने से रोकना था। भुट्टो को एक राजनीतिक विरोधी की हत्या का आदेश देने के आरोप में गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया। इसी के साथ भुट्टो युग का अंत हो गया, और पाकिस्तान में जिया-उल-हक के सैन्य शासन की शुरुआत हुई। 1971 में जो सैन्य दखल कुछ समय के लिए थमा था, वह 1977 में पूर्ण रूप से वापस आ गया और तब से लेकर आज तक पाकिस्तान की राजनीति में सेना का हस्तक्षेप जारी है। यह घटनाक्रम आज भी पाकिस्तान में लोकतंत्र के संघर्ष का एक प्रमुख कारण बना हुआ है।
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