Iran ने सऊदी पर दागीं मिसाइलें तो फंसा पाकिस्तान, भागते फिर रहे Asim Munir?
रियाद। रियाद और इस्लामाबाद के बीच हालिया कूटनीतिक हलचल ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण अब पाकिस्तान के लिए धर्मसंकट की स्थिति पैदा हो गई है। हालात कुछ इस तरह मीडिया में बताए जा रहे हैं कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर इस मामले को लेकर भागते फिरते नजर आ रहे हैं ताकि पाकिस्तान पर किसी तरह का कोई आरोप न लगे। हाल ही में ईरान द्वारा सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाए जाने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ डिफेंस एग्रीमेंट सक्रिय हो जाएगा? इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि किसी भी एक देश पर होने वाला हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस अनिश्चितता के बीच सऊदी रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान और पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की मुलाकात ने अटकलों को और तेज कर दिया है। सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति और विशेष रूप से सऊदी अरब पर हुए ईरानी हमलों के बाद के घटनाक्रमों पर विस्तार से चर्चा की गई। दोनों देशों के बीच रक्षा समझौते की नींव सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सऊदी अरब यात्रा के दौरान रखी गई थी। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने भी हाल ही में ईरान के साथ बातचीत में इस समझौते का स्पष्ट उल्लेख किया है। हालांकि, ईरान ने पाकिस्तान से यह आश्वासन चाहा है कि सऊदी जमीन का उपयोग उसके खिलाफ किसी भी हमले के लिए नहीं किया जाएगा। तकनीकी रूप से इस समझौते का अर्थ यह नहीं है कि पाकिस्तान को तुरंत और अनिवार्य रूप से युद्ध के मैदान में उतरना ही होगा।
कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, समझौते के तहत सैन्य कार्रवाई अनिवार्य नहीं है और दोनों देश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए सहायता का स्वरूप तय कर सकते हैं। इसके बावजूद, पाकिस्तान के लिए तटस्थ बने रहना किसी चुनौती से कम नहीं है। पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी बाधा उसकी आर्थिक निर्भरता और आंतरिक सामाजिक ढांचा है। एक ओर सऊदी अरब पाकिस्तान का सबसे बड़ा आर्थिक मददगार है, जहां रहने वाले करीब 40 लाख पाकिस्तानी श्रमिक देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। तेल आपूर्ति से लेकर नकदी संकट तक, सऊदी अरब हमेशा पाकिस्तान का सहारा रहा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान की 15 से 20 प्रतिशत आबादी शिया समुदाय की है, जिसके ईरान के साथ गहरे धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध हैं। ईरान के खिलाफ किसी भी प्रत्यक्ष सैन्य गठबंधन में शामिल होने से पाकिस्तान के भीतर गंभीर सांप्रदायिक और राजनीतिक अस्थिरता पैदा होने का खतरा है। हाल के दिनों में पाकिस्तान के विभिन्न शहरों में ईरान के समर्थन में हुए प्रदर्शनों ने सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
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