चीन को राहत देंगे पर ताइवान को हथियार नहीं देंगे Trump?
बीजिंग से लौटते ही बदले डोनाल्ड ट्रंप के सुर
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बीजिंग के अपने हालिया दौरे से लौटने के बाद चीन के प्रति बेहद नरम रुख अपनाते दिख रहे हैं। अचानक आए इस रणनीतिक बदलाव से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या ट्रंप चीनी दबाव के आगे झुक गए हैं। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई उच्च स्तरीय बैठक के बाद ट्रंप ने कई ऐसे बयान दिए हैं, जो अमेरिका की पारंपरिक विदेश नीति के बिल्कुल विपरीत नजर आ रहे हैं। ट्रंप ने अमेरिका पहुंचने से पहले ही एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान चीन को एक बड़ी राहत के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि वह जल्द ही उन चीनी कंपनियों पर से प्रतिबंध हटाने पर विचार कर सकते हैं, जो ईरान से तेल खरीद रही हैं। इन कंपनियों पर हाल ही में अमेरिका ने सख्त रुख अपनाते हुए पाबंदियां लगाई थीं, जिनमें चीन की दिग्गज रिफाइनरी हेंगली पेट्रोकेमिकल भी शामिल है। दरअसल, चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है और होर्मुज संकट के चलते वह पहले ही कम तेल खरीद पा रहा था। अमेरिकी प्रतिबंधों ने उसकी मुश्किलें और बढ़ा दी थीं।
हालांकि, ट्रंप के इस बदले रुख के पीछे एक बड़ा व्यापारिक कारण माना जा रहा है। ट्रंप का दावा है कि चीन ने अमेरिका से और अधिक मात्रा में तेल खरीदने का वादा किया है, जिसके बदले में अमेरिकी राष्ट्रपति चीनी कंपनियों को राहत देने का मन बना रहे हैं। इस बदलाव का सबसे बड़ा असर ताइवान के मुद्दे पर देखने को मिला है। ट्रंप ने ताइवान को दिए जाने वाले 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज को मंजूरी देने पर संशय जाहिर किया है। एक इंटरव्यू में उन्होंने स्पष्ट कहा कि अमेरिका को अपने से 9500 मील दूर एक और युद्ध की जरूरत नहीं है। इतना ही नहीं, ट्रंप ने शी जिनपिंग के साथ इस मुद्दे पर सीधे बातचीत भी की, जो कि 1982 की अमेरिकी नीति का उल्लंघन माना जा रहा है। ट्रंप के इस रुख से ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे पारंपरिक अमेरिकी सहयोगियों की चिंताएं बढ़ गई हैं कि कहीं अमेरिका चीन के दबाव में आकर उन्हें अकेला न छोड़ दे।
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