ईरान युद्ध की बढ़ती लागत और वैश्विक दबाव से घिरे US President Donald Trump
वाशिंगटन। ईरान के साथ जारी भीषण संघर्ष के तीसरे हफ्ते में प्रवेश करते ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बड़ी कूटनीतिक और सैन्य दुविधा में फंसते नजर आ रहे हैं। युद्ध की भारी-भरकम लागत और ईरान के कड़े पलटवार ने वाशिंगटन की चिंताओं को बढ़ा दिया है। रणनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि ट्रंप अब इस महंगी जंग से बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता तलाश रहे हैं, लेकिन जमीनी हालात उन्हें और अधिक उलझाते जा रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह न तो ईरान को झुकने पर मजबूर कर पाया है और न ही वहां सत्ता परिवर्तन के अपने शुरुआती लक्ष्य को हासिल कर सका है। इसके उलट, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति ठप हो गई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाहाकार मचा हुआ है। ईरान ने इस युद्ध का दायरा बढ़ाते हुए कतर और सऊदी अरब की तेल-गैस सुविधाओं को भी निशाना बनाया है, जिससे खाड़ी देशों में असुरक्षा का माहौल है। हैरानी की बात यह है कि इस संकट की घड़ी में अमेरिका वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ता दिख रहा है। नाटो देशों और यूरोप ने स्पष्ट कर दिया है कि यह अमेरिका की अपनी निजी जंग है और इसमें उनकी कोई भागीदारी नहीं है।
यूरोपीय नेताओं का तर्क है कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई से पहले उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया था। इस कूटनीतिक दूरी ने वाशिंगटन के मनोबल पर गहरा असर डाला है। वहीं, अमेरिका और इजरायल के बीच भी सुर बदलते दिखाई दे रहे हैं। बुधवार को ईरान के साउथ पार्स जैसे दुनिया के सबसे बड़े गैस क्षेत्र पर हुए हमले के बाद दोनों सहयोगियों में दरार उजागर हो गई। जहाँ इजरायली अधिकारी इस हमले को अमेरिका के साथ मिलकर किया गया साझा ऑपरेशन बता रहे हैं, वहीं अमेरिकी रक्षा विभाग अब इससे पल्ला झाड़ रहा है। जानकारों का मानना है कि अमेरिका का यह इनकार इस बात का संकेत है कि वह अब और अधिक जिम्मेदारी लेने से बच रहा है। ईरान के सरकारी मीडिया ने भी पुष्टि की है कि उसकी प्राकृतिक गैस उत्पादन सुविधाओं के कुछ हिस्सों को भारी नुकसान पहुँचाया गया है। अब देखना यह होगा कि ट्रंप प्रशासन इस महंगी हार और अधूरी जीत के बीच क्या फैसला लेता है।
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