नदियों से खत्म हो रही रेत, रुक जाएगा Construction का काम
हनोई। नदियों से जिस रफ्तार से रेत निकाली जा रही है, वह प्रकृति की नई रेत बनाने की क्षमता से कहीं अधिक है। इसका सीधा और भयावह मतलब यह है कि हमारी नदियां सचमुच रेत-विहीन होती जा रही हैं। दुनिया भर में औद्योगिक स्तर पर रेत का खनन (इंडस्ट्रियल सैंड माइनिंग) बहुत तेजी से बढ़ गया है, जिसने पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के लिए गंभीर चिंता पैदा कर दी है। हाल ही में वैज्ञानिकों ने 1974 के बाद से हुई 411 स्टडीज का गहन रिव्यू किया गया है। इस रिव्यू से पता चलता है कि वैश्विक स्तर पर नदी की रेत और बजरी की मांग बहुत ज्यादा है, क्योंकि इनका इस्तेमाल कंक्रीट जैसे कंस्ट्रक्शन मटेरियल बनाने के लिए बड़े पैमाने पर होता है। लेकिन रेत निकालने का यह तरीका कतई टिकाऊ नहीं है, और इसके विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। यह रिसर्च स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि अगर हमने रेत खनन को नहीं रोका, तो इसके नतीजे भयंकर होंगे। नदियों का नाजुक इकोसिस्टम पूरी तरह तबाह हो जाएगा, कई नदियां सूख जाएंगी, और अंततः कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री पूरी तरह से ठप पड़ जाएगी, जिससे अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा। इस संकट का एक ज्वलंत उदाहरण वियतनाम की मेकांग नदी है, जिसका हाल बहुत बुरा हो चुका है। रेत खनन के कारण इस नदी के तल में 0.48 मीटर की कमी आई है, जिसका मतलब है कि नदी की गहराई लगभग आधा मीटर कम हो गई है। पानी की सतह पर यह बड़ा बदलाव तुरंत नहीं दिखता, लेकिन इसका नदी के बहाव और किनारों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। मेकांग नदी में रेत खनन के कारण वियतनाम में नदी के किनारे कट रहे हैं, और इसी वजह से 2018 और 2020 के बीच 1800 से ज्यादा घर ढह गए।
साल 2023 तक, वियतनाम की मेकांग में 741 किलोमीटर लंबी नदी में 585 प्रमुख कटाव वाले हॉटस्पॉट बन गए हैं। नदी के तल में इन बदलावों से बैकवाटर इफेक्ट बढ़ता है, जिसमें खारा पानी नदी में बहुत ऊपर तक पहुंच जाता है, जिससे कृषि और पीने के पानी की समस्या खड़ी हो जाती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर रेत खनन की यही रफ्तार रही, तो 2035 तक वियतनाम की मेकांग में कोई रेत नहीं बचेगी। यह स्थिति दुनिया के अन्य देशों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। मेकांग नदी केवल कंस्ट्रक्शन बूम का एक शिकार भर है; दुनिया भर में कंक्रीट और बिल्डिंग मटेरियल बनाने के लिए रेत की मांग लगातार बढ़ी है। चीन की पोयांग झील में बहुत भारी बदलाव हुए हैं जो अंतरिक्ष से भी दिखाई देते हैं। भारत के भी कई जलमार्गों का यही हाल हुआ है, जिनमें मयूराक्षी, कोल्लिडम, सुबर्णरेखा और अजय जैसी नदियां शामिल हैं। ब्राजील में पराना और टोकांटिन्स नदियों को भी सैंड माइनिंग ने बदल दिया है, जो अमेजन बेसिन का हिस्सा हैं। फ्रांस की सीन नदी में भी खनन के कारण बहुत नुकसान हुआ है। पिछले दो दशकों में नदी की रेत की अंतरराष्ट्रीय मांग बहुत तेजी से बढ़ी है।
एनटीयू सिंगापुर के जियोग्राफर और स्टडी के लीड ऑथर एडवर्ड पार्क ने इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि रेत और बजरी दुनिया में सबसे ज्यादा निकाले जाने वाले सॉलिड मटेरियल हैं। इनका शहरीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट में अहम रोल है, क्योंकि कंक्रीट में 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा रेत और बजरी का होता है। कंक्रीट, डामर, सड़क और बिल्डिंग बनाने में इनका इस्तेमाल होता है। पार्क ने कहा कि नदी की रेत कंस्ट्रक्शन के लिए खास तौर पर कीमती है, क्योंकि इसके कण सही फ्रिक्शन देते हैं और यह खारी नहीं होती, जबकि रेगिस्तानी रेत फिसलने वाली होती है और समुद्री रेत खारी होती है। रेत संकट से निपटने के लिए हमें अब कई कदम उठाने होंगे। स्टडी के मुताबिक, कई देशों के पास अपनी आर्थिक जरूरतों और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए पर्याप्त डेटा ही नहीं है। ट्रान ने कहा कि रेत निकालना चुनी हुई जगहों पर ही होना चाहिए।
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