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  • Wednesday, 30 September 2026
Jinping से पूछ बैठे ट्रंप- क्या थाड और एफ-35 खरीदोगे?

Jinping से पूछ बैठे ट्रंप- क्या थाड और एफ-35 खरीदोगे?

बीजिंग। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के हालिया अमेरिका दौरे को लेकर एक दिलचस्प और हैरान करने वाला खुलासा सामने आया है। चीन में तैनात अमेरिकी राजदूत डेविड परड्यू ने एक साक्षात्कार के दौरान बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में हुई मुलाकात के दौरान चीन के राष्ट्रपति के सामने एक अजीब प्रस्ताव रखा था। ट्रंप ने बैठक में अचानक शी जिनपिंग से पूछ लिया कि क्या चीन अमेरिका से हथियार खरीदना चाहेगा। कूटनीतिक हलकों में यह सवाल इसलिए बेहद चौंकाने वाला माना जा रहा है क्योंकि अमेरिका पारंपरिक रूप से चीन के कड़े प्रतिद्वंद्वी ताइवान को लगातार अत्याधुनिक हथियार बेचता रहा है, जिसे बीजिंग अपना हिस्सा मानता है।


परड्यू के मुताबिक, इस बैठक के दौरान ट्रंप ने ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री का जिक्र करते हुए इसे दुनिया के अन्य देशों के साथ होने वाली एक सामान्य रक्षा डील की तरह पेश किया था। इसी बातचीत के सिलसिले में उन्होंने मजाकिया अंदाज में चीनी राष्ट्रपति के सामने अमेरिकी रक्षा उपकरण खरीदने का यह सवाल दागा। हालांकि इसे एक हल्के-फुल्के और मजाकिया लहजे में पूछा गया था, लेकिन इस अप्रत्याशित सवाल ने कुछ पलों के लिए शी जिनपिंग को भी अचंभित कर दिया होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति अपने इस तरह के अनूठे और तीखे व्यंग्य भरे अंदाज के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। यह दिलचस्प खुलासा ऐसे समय में सामने आया है जब हाल ही में चीन द्वारा हांगकांग भेजे गए कुछ संवेदनशील अमेरिकी एफ-35 लड़ाकू विमानों के पार्ट्स हासिल करने की खबरें आई थीं। शी जिनपिंग की इस उच्चस्तरीय अमेरिका यात्रा के दौरान दोनों महाशक्तियों के शीर्ष नेताओं के बीच व्यापार, क्षेत्रीय सुरक्षा और द्विपक्षीय रिश्तों से जुड़े कई अन्य अहम मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई थी। इस बीच अमेरिका के भीतर कुछ रिपब्लिकन और डेमोक्रेट सांसदों ने ताइवान को अमेरिकी हथियारों की डिलीवरी में हो रही देरी को लेकर सवाल खड़े किए हैं और यह आशंका जताई है कि कहीं अमेरिका बीजिंग के साथ संबंध सुधारने के चक्कर में ताइवान को हथियारों की आपूर्ति धीमी तो नहीं कर रहा है। हालांकि अमेरिकी राजदूत डेविड परड्यू ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि हथियारों की बिक्री और उनकी डिलीवरी से जुड़े प्रशासनिक मुद्दों को किसी भी देश को खुश करने की रणनीति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

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