चार दशकों से भटक रहा विशाल हिमखंड हो चुका है अदृश्य
वॉशिंगटन। पिछले चार दशकों से दक्षिणी महासागर में भटक रहा एक विशाल हिमखंड अब पूरी तरह से अदृश्य हो चुका है। इस विशाल हिमखंड को ए23ए के नाम से जाना जाता था। यह हिमखंड, जो आकार में गोवा राज्य से भी बड़ा और ग्रेटर लंदन के क्षेत्रफल का दोगुना था। इसकी 40 साल की लंबी और अनोखी यात्रा अब समाप्त हो गई है, और इसके अवशेष इतने छोटे हो चुके हैं कि उपग्रहों से भी इन्हें ट्रैक करना असंभव है, जिससे इसे औपचारिक रूप से गायब घोषित कर दिया गया है। यह हिमखंड वैज्ञानिकों के लिए एक चलता-फिरता प्रयोगशाला था। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह केवल एक हिमखंड के पिघलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह अंटार्कटिका, महासागरों और जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए किए जा रहे एक लंबे और महत्वपूर्ण प्रयोग का अंत है। ए23ए सबसे पहले 1986 में प्रकाश में आया था, जब यह अंटार्कटिका की विशाल फिल्चनर आइस शेल्फ से टूटकर अलग हुआ था। आइस शेल्फ, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, समुद्र के ऊपर तैरने वाली बर्फ की विशाल चट्टानें होती हैं जो महाद्वीपीय बर्फ की चादरों से जुड़ी होती हैं। समय के साथ इनमें दरारें पड़ती हैं और बड़े-बड़े हिस्से टूटकर समुद्र में बह जाते हैं, इस प्रक्रिया को कैल्विंग कहते हैं।
हालाँकि, ए23ए खास इसलिए था क्योंकि टूटने के बाद यह तुरंत समुद्र में नहीं बहा था। यह इतना बड़ा था कि वेडेल सागर में फंस गया और तकरीबन तीन दशकों से भी अधिक समय तक वहीं स्थिर बना रहा। यह इसकी यात्रा का सबसे लंबा ठहराव था, जिसने वैज्ञानिकों को इसके व्यवहार का अध्ययन करने का अनूठा अवसर प्रदान किया। तकरीबन 34 साल बाद, समुद्री धाराओं की वजह से यह विशाल हिमखंड वेडेल सागर से बाहर निकला और दक्षिणी महासागर में अंटार्कटिका से दूर अपनी यात्रा शुरू की। इसने तकरीबन 2 हजार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की, इस दौरान दुनिया भर के वैज्ञानिक और अंतरिक्ष एजेंसियां इसकी गतिविधियों पर बारीकी से नज़र रखे हुए थीं। अंटार्कटिका से दूर जाना ही इसके लिए मुसीबत बन गया, क्योंकि दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्रों में पानी ठंडा होता है जो हिमखंडों को सुरक्षित रखता है। जैसे ही ए23ए उत्तर की ओर बढ़ा, यह गर्म पानी वाले क्षेत्रों में पहुंच गया, जहाँ तापमान बढ़ने के कारण यह छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखर गया और धीरे-धीरे पिघल कर अदृश्य हो गया। वैज्ञानिकों के लिए ए23ए सिर्फ एक हिमखंड नहीं था, बल्कि एक प्राकृतिक प्रयोगशाला थी।
इसके माध्यम से वे यह पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि समुद्री धाराएं बड़े हिमखंडों को कैसे प्रभावित करती हैं, पिघलती बर्फ महासागरों में मीठे पानी की मात्रा और संरचना को कैसे बदलती है, और हिमखंड पोषक तत्वों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक कैसे पहुंचाते हैं। साथ ही, वे यह भी समझ रहे थे कि अंटार्कटिका की बर्फ जलवायु परिवर्तन के प्रति किस प्रकार प्रतिक्रिया दे रही है। सीधे तौर पर ए23ए के पिघलने से समुद्र के जलस्तर में कोई बड़ी वृद्धि नहीं हुई, क्योंकि यह हिमखंड पहले से ही समुद्र में तैर रहा था (इसे एक गिलास में तैरती बर्फ से समझा जा सकता है)। हालांकि, वैज्ञानिकों की चिंता इससे अलग है; उन्हें आइस शेल्फ की स्थिरता की फिक्र है, क्योंकि यदि ये कमजोर हो जाएं तो इनके पीछे मौजूद विशाल भूमि-आधारित बर्फ समुद्र में बह सकती है, यही प्रक्रिया भविष्य में समुद्र के जलस्तर को बढ़ाने का बड़ा कारण बन सकती है। यह हिमखंड पिघलने का सीधा अर्थ जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जा रहा है।
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