Developed Countries में अकेले रहने वाली महिलाओं की लगातार बढ़ रही संख्या
वॉशिंगटन। विकसित देशों में बिना शादी और बिना बच्चों के जीवन बिताने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आज की कई महिलाएं विवाह को अनिवार्यता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पसंद का विषय मान रही हैं और करियर, आत्मविकास, आर्थिक स्वतंत्रता तथा अपनी पसंद की जीवनशैली को अधिक महत्व दे रही हैं। प्यू रिसर्च सेंटर, अमेरिकी जनगणना ब्यूरो और मॉर्गन स्टेनली की विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और अन्य विकसित देशों में अकेले रहने वाली महिलाओं के घरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में महिलाएं पहले की तुलना में अधिक उम्र में विवाह कर रही हैं, कम बच्चे पैदा कर रही हैं या फिर मातृत्व का विकल्प ही नहीं चुन रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव के पीछे उच्च शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, बेहतर रोजगार के अवसर, बढ़ती औसत आयु और बदलती सामाजिक सोच प्रमुख कारण हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली महिलाएं पहले अपने करियर और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रही हैं। अच्छी आय और वित्तीय सुरक्षा मिलने के बाद उन पर विवाह का सामाजिक या आर्थिक दबाव पहले जैसा नहीं रह गया है।
कई महिलाएं स्वयं घर खरीद रही हैं, वाहन चला रही हैं और स्वतंत्र रूप से जीवनयापन कर रही हैं। ऐसे में विवाह अब उनके लिए आवश्यकता के बजाय व्यक्तिगत निर्णय बन गया है। कई महिलाओं का मानना है कि यदि उपयुक्त जीवनसाथी नहीं मिलता या संबंध तनावपूर्ण हो सकते हैं, तो अकेले रहना बेहतर विकल्प है। यह प्रवृत्ति केवल अमेरिका और यूरोप तक सीमित नहीं है। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी विवाह और जन्म दर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इन देशों में सिंगल सोसाइटी की अवधारणा पर व्यापक चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि कम जन्म दर के कारण भविष्य में वृद्ध आबादी का अनुपात बढ़ सकता है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की संभावना है। भारत में भी महानगरों और बड़े शहरों में इस तरह का बदलाव धीरे-धीरे दिखाई देने लगा है। शिक्षित और कामकाजी महिलाओं के बीच देर से विवाह करने या संतान न रखने का निर्णय पहले की तुलना में अधिक स्वीकार्य होता जा रहा है। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों में अब भी पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था और सामाजिक अपेक्षाओं का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलती सामाजिक प्रवृत्ति केवल परिवार की संरचना को ही नहीं, बल्कि आवास, रोजगार, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करेगी। अकेले रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ने से छोटे फ्लैटों और एकल आवासों की मांग बढ़ रही है, जबकि घटती जन्म दर भविष्य में श्रमशक्ति और जनसंख्या संरचना पर भी असर डाल सकती है। उनका कहना है कि बदलती परिस्थितियों के अनुरूप सामाजिक और आर्थिक नीतियों में भी समय के साथ बदलाव की आवश्यकता होगी। मालूम हो कि दुनिया के कई देशों में परिवार और विवाह को लेकर पारंपरिक सोच तेजी से बदल रही है। एक समय था जब महिलाओं के जीवन में विवाह और मातृत्व को सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता था, लेकिन अब शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं के कारण यह धारणा बदलती दिखाई दे रही है।
Comment / Reply From
You May Also Like
Popular Posts
Newsletter
Subscribe to our mailing list to get the new updates!