तेहरान की पार्टियों से शुरू हुआ था गायिका Sharda का सफर
मुंबई। वर्ष 1960 के दशक में अपनी मधुर आवाज से लोकप्रियता हासिल करने वाली भारतीय पार्श्व गायिका शारदा राजन अयंगर की फिल्मी दुनिया तक पहुंचने की कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम दिलचस्प नहीं है। शारदा का गायन सफर ईरान की राजधानी तेहरान में आयोजित भारतीय समुदाय की पार्टियों से शुरू हुआ था। पार्टी में गाना गा रही शारदा की आवाज ने अभिनेता और फिल्म निर्माता राज कपूर का ध्यान आकर्षित किया। बताया जाता है कि तेहरान में फिल्म वितरक श्रीचंद आहूजा ने राज कपूर के लिए एक पार्टी आयोजित की थी। इस कार्यक्रम में शारदा ने अपनी आवाज में गाने प्रस्तुत किए। उनकी गायकी से राज कपूर काफी प्रभावित हुए। उन्होंने शारदा को मुंबई आने का निमंत्रण दिया। इसके बाद शारदा मुंबई पहुंचीं, जहां राज कपूर ने उनकी मुलाकात संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन के शंकर से कराई। उन्होंने उस्ताद जगन्नाथ प्रसाद और गायक मुकेश से भी संगीत की शिक्षा ली।
शारदा ने वर्ष 1966 में फिल्म सूरज से हिंदी फिल्म जगत में कदम रखा। इस फिल्म का उनका गाया गीत तितली उड़ी, उड़ जो चली बेहद लोकप्रिय हुआ। गीत की सफलता ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने गुमनाम, शतरंज और अराउंड द वर्ल्ड जैसी फिल्मों में भी गाने गाए। उनकी आवाज में एक अलग तरह की मिठास थी, जिसने उन्हें उस दौर के अन्य गायकों के बीच विशिष्ट स्थान दिलाया। अपने करियर के दौरान शारदा ने मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मुकेश, आशा भोसले और के.जे. येसुदास जैसे प्रतिष्ठित गायकों के साथ काम किया। उन्होंने वैजयंतीमाला, साधना, हेमा मालिनी, रेखा, शर्मिला टैगोर और मुमताज जैसी अभिनेत्रियों के लिए भी पार्श्व गायन किया। वर्ष 1969 से 1972 तक उन्हें लगातार फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।
वर्ष 1971 में शारदा ने सिजलर्स नाम से एक पॉप एल्बम रिकॉर्ड किया। इसे किसी भारतीय महिला गायिका के शुरुआती पॉप एल्बमों में शामिल किया जाता है। वर्ष 2007 में उन्होंने मिर्जा गालिब की गजलों पर आधारित एल्बम अंदाज-ए-बयां भी जारी किया। फिल्म कांच की दीवार में वर्ष 1986 में उन्होंने आखिरी बार फिल्मों के लिए गाना गाया। शारदा के करियर से जुड़ी एक चर्चित कहानी फिल्मफेयर पुरस्कारों की श्रेणियों में बदलाव से भी संबंधित है। बताया जाता है कि तितली उड़ी और मोहम्मद रफी के गीत बहारों फूल बरसाओ को समान वोट मिले थे। हालांकि, पुरस्कार रफी को मिला और शारदा को विशेष पुरस्कार दिया गया। इसके बाद अगले वर्ष से पुरुष और महिला पार्श्व गायकों के लिए अलग-अलग श्रेणियां बनाई गईं, ऐसा अक्सर बताया जाता है। शारदा ने हिंदी के अलावा तेलुगू, मराठी, अंग्रेजी और गुजराती भाषाओं में भी गाने गाए।
कैंसर से जूझने के बाद 14 जून 2023 को मुंबई में उनका निधन हो गया। उनका संगीत आज भी पुराने हिंदी फिल्मी गीतों के शौकीनों के बीच याद किया जाता है। मालूम हो कि शारदा का जन्म 25 अक्टूबर 1933 को तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था। बचपन से ही उन्हें संगीत में रुचि थी। वह हिंदी गानों को तमिल भाषा में लिखती थीं और उन्हें गुनगुनाती रहती थीं। धीरे-धीरे यह शौक उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। बाद में उनका परिवार तेहरान चला गया। वहां भारतीय समुदाय के कार्यक्रमों और पार्टियों में शारदा गाने गाया करती थीं। इसी दौरान उनकी मुलाकात ऐसे लोगों से हुई, जिन्होंने उनके लिए फिल्मी दुनिया के दरवाजे खोलने में भूमिका निभाई।
Comment / Reply From
You May Also Like
Popular Posts
Newsletter
Subscribe to our mailing list to get the new updates!