युद्ध से रूस की चमकी किस्मत: तेल की बढ़ती कीमतों ने Putin के युद्ध फंड को किया मालामाल
मॉस्को। पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच छिड़ा भीषण संघर्ष न केवल खाड़ी देशों को दहला रहा है, बल्कि इसका एक अप्रत्याशित और गहरा असर हजारों किलोमीटर दूर चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध पर भी पड़ रहा है। मिडिल ईस्ट में बढ़ती अस्थिरता के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिसका सबसे बड़ा और सीधा फायदा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को मिल रहा है। तेल की इन बढ़ती कीमतों ने रूस की उन तमाम आर्थिक बाधाओं को दूर कर दिया है, जो पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के कारण पैदा हुई थीं। इस पूरे घटनाक्रम में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (हॉर्मुज जलडमरूमध्य) की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होकर उभरी है। यह जलमार्ग दुनिया का सबसे प्रमुख एनर्जी चोकपॉइंट है, जहां से वैश्विक तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। ईरान युद्ध के कारण इस समुद्री रास्ते पर पैदा हुई रुकावटों ने दुनिया भर के देशों को मजबूर कर दिया है कि वे ऊर्जा आपूर्ति के लिए फिर से रूस का रुख करें। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने भी स्वीकार किया है कि रूसी ऊर्जा की मांग में जबरदस्त इजाफा हुआ है और बाजार अब एक भरोसेमंद सप्लायर के रूप में रूस की ओर देख रहे हैं। यूक्रेन पर हमले के बाद रूस का यूराल्स क्रूड अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी सस्ता बिक रहा था, लेकिन ईरान संकट ने पासा पूरी तरह पलट दिया है।
अब रूसी तेल न केवल महंगा हुआ है, बल्कि यह ब्रेंट क्रूड के मुकाबले प्रीमियम कीमतों पर बिक रहा है। भारत जैसे बड़े तेल खरीदारों के लिए रूस अब सबसे प्रमुख विकल्प बन गया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अमेरिका ने भी भारत को समुद्र में फंसे रूसी तेल को खरीदने के लिए 30 दिनों की विशेष छूट दी है, ताकि वैश्विक बाजार में तेल की किल्लत को संतुलित किया जा सके। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान संकट से पहले रूस अपनी सैन्य अर्थव्यवस्था को लेकर काफी दबाव में था, लेकिन तेल की कीमतों में पिछले एक हफ्ते में हुई 25 से 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी ने पुतिन को एक नई लाइफलाइन दे दी है। यूराल्स क्रूड की कीमत 45 डॉलर से उछलकर करीब 68 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। यह अतिरिक्त मुनाफा सीधे रूस के युद्ध कोष में जा रहा है, जिससे यूक्रेन की उन कोशिशों पर पानी फिरने का खतरा पैदा हो गया है, जिसका मकसद रूस की आय के स्रोतों को नष्ट करना था। यदि फारस की खाड़ी का यह संकट लंबा खिंचता है, तो रूस आर्थिक रूप से इतना सशक्त हो जाएगा कि वह यूक्रेन के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को कई और वर्षों तक जारी रख सकेगा।
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