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Indonesia में जेन-जी का सरकार के खिलाफ विशाल प्रदर्शन

Indonesia में जेन-जी का सरकार के खिलाफ विशाल प्रदर्शन

महंगाई और खर्चीली योजनाओं पर उठाए सवाल -ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी और ‘फ्री मील’ योजना के विरोध में हजारों छात्र सड़कों पर उतरे, जकार्ता में झड़पें

जकार्ता। इंडोनेशिया में राष्ट्रपति प्रबोवो सुबैंतो की सरकार के खिलाफ युवाओं का असंतोष खुलकर सामने आया है। राजधानी जकार्ता में हजारों छात्रों और युवाओं ने आर्थिक नीतियों, बढ़ती महंगाई और सरकारी खर्चों के विरोध में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया। दिवालिया इंडोनेशिया की ओर नाम से चलाए गए इस आंदोलन में प्रदर्शनकारियों ने सरकार से ईंधन कीमतों में वृद्धि वापस लेने और महंगी कल्याणकारी योजनाओं की समीक्षा करने की मांग की। प्रदर्शन का केंद्र सरकार की ‘फ्री न्यूट्रिशियस मील’ योजना रही, जिसकी वार्षिक लागत लगभग 15 अरब डॉलर बताई जा रही है। छात्रों का आरोप है कि यह योजना देश की वित्तीय स्थिति पर भारी बोझ डाल रही है और इसके क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार तथा कुप्रबंधन के आरोप भी सामने आए हैं। कुछ क्षेत्रों में स्कूली बच्चों के भोजन से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं ने भी विवाद को बढ़ाया है। युवाओं ने सरकार के समक्ष पांच प्रमुख मांगें रखीं, जिनमें ईंधन और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में कमी, सरकारी फिजूलखर्ची पर रोक, मुफ्त भोजन योजना को निलंबित करना तथा सार्वजनिक धन के उपयोग में पारदर्शिता बढ़ाना शामिल है। यह आंदोलन ऐसे समय में सामने आया है जब इंडोनेशियाई मुद्रा दबाव में है और हाल ही में ईंधन की कीमतों में लगभग 32 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत ने विशेष रूप से युवाओं और मध्यम वर्ग की चिंताओं को बढ़ा दिया है।

छात्र कॉलेज यूनिफॉर्म पहन सड़कों पर उतरे जकार्ता में प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में छात्र अपनी कॉलेज यूनिफॉर्म पहनकर सड़कों पर उतरे। सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए 4,000 से अधिक पुलिस और सैन्यकर्मियों की तैनाती की गई थी। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच बैरिकेड्स हटाने को लेकर झड़पें भी हुईं। आर्थिक मुद्दों के अलावा छात्रों ने नागरिक मामलों में सेना की बढ़ती भूमिका पर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। इस आंदोलन ने इंडोनेशिया में युवाओं की राजनीतिक सक्रियता और आर्थिक नीतियों को लेकर बढ़ती बेचैनी को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

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