US-Iran शांतिवार्ता में पाकिस्तान की दोहरी नीति बेनकाब
ट्रंप प्रशासन ने कूटनीतिक मोर्चे पर घेर लिया
वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव के बीच पाकिस्तान एक बार फिर अपनी कूटनीतिक दोहरी नीति के कारण वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ता दिख रहा है। खुद को वैश्विक शांति का दूत दिखाने और अमेरिका-ईरान शांति वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका भुनाने की कोशिश कर रहा पाकिस्तान अब खुद गंभीर कूटनीतिक सवालों के घेरे में आ गया है। अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने खुले तौर पर पाकिस्तान की भूमिका को संदिग्ध और बेहद समस्याग्रस्त करार दिया है। इस बयान के बाद इस्लामाबाद के राजनीतिक और सैन्य गलियारों में हड़कंप मच गया है। दरअसल, शुरुआत में पाकिस्तान ने अमेरिकी प्रशासन को लुभाने की भरपूर कोशिश की थी। ईरान संकट के दौरान इस्लामाबाद ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की मेजबानी की थी और मध्यस्थता का पूरा श्रेय लेने के लिए अमेरिकी नेतृत्व की जमकर तारीफें की थीं। लेकिन जैसे-जैसे शांति वार्ता आगे बढ़ी, पाकिस्तान का दोहरा चरित्र सामने आने लगा। एक तरफ जहां पाकिस्तान दुनिया के सामने पीस ब्रोकर की छवि पेश कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ खुफिया रिपोर्ट्स आईं कि उसने ईरान के सैन्य विमानों को अपने नूर खान एयरबेस पर गुपचुप तरीके से पनाह दे रखी है। इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने साफ कहा कि पाकिस्तान मध्यस्थ से ज्यादा एक समस्या है, और यदि ईरानी विमान पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर सुरक्षित हैं, तो वह निष्पक्ष मध्यस्थ कैसे हो सकता है? अमेरिकी प्रशासन को अब यह साफ समझ आ रहा है कि पाकिस्तान मध्यस्थता का राजनीतिक फायदा तो उठाना चाहता है, लेकिन वह ईरान के साथ अपने पुराने सैन्य और रणनीतिक संबंध भी नहीं छोड़ना चाहता। इस कूटनीतिक रस्साकशी के बीच अमेरिका द्वारा प्रस्तावित अब्राहम अकॉर्ड्स ने पाकिस्तान की पोल पूरी तरह खोल दी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने हाल ही में सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और जॉर्डन जैसे देशों से इस ऐतिहासिक समझौते में शामिल होने और इसे ईरान डील का हिस्सा बनाने की अपील की थी। इस पर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने स्पष्ट रूप से अमेरिकी प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि वे किसी ऐसे समझौते का समर्थन नहीं कर सकते जो उनकी मूल विचारधारा से टकराता हो। उन्होंने इजरायल को मान्यता देने के लिए 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य और पूर्वी यरुशलम को उसकी राजधानी बनाने की पुरानी शर्त दोहराई। आर्थिक तंगहाली और कंगाली से जूझ रहा पाकिस्तान एक तरफ अमेरिका से वित्तीय मदद और आईएमएफ बेलआउट पैकेज चाहता है, तो दूसरी तरफ वह अमेरिका की किसी भी रणनीतिक मांग को मानने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान ने गाजा स्टेबलाइजेशन फोर्स में शामिल होने, ईरान का गुप्त समर्थन बंद करने और अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनने से साफ इनकार कर तीन बड़े मुद्दों पर अमेरिका की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। नतीजतन, अमेरिका में पाकिस्तान के प्रति कड़ा मोहभंग देखा जा रहा है और वाशिंगटन उसे एक अवसरवादी खिलाड़ी मान रहा है। यही वजह है कि पाकिस्तान अब दोबारा चीन की ओर मुड़ रहा है, जहां चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को नई गति दी जा रही है। सुरक्षा के नाम पर चीन अपनी सैन्य टुकड़ियां भी पाकिस्तान भेजने लगा है। इस बदलते परिदृश्य में अमेरिका का झुकाव तेजी से भारत की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति का लगातार भारत के पक्ष में बयान देना, अमेरिकी विदेश मंत्री का भारत में तीन दिन बिताना और सर्जियो गोर द्वारा दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत करने के प्रयास यह दर्शाते हैं कि सुपरपावर अब दक्षिण एशिया में एक भरोसेमंद और मजबूत साझेदार के रूप में केवल भारत को देख रहा है।
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