Burkina Faso से सोना नहीं ले जा सकेंगे दूसरे देश, विदेश दबदबा होगा खत्म
-राष्ट्रपति ने कहा- सरकार का रहेगा कब्जा ‘हम अपना सोना खुद निकालेंगे
बुर्किना फासो। अफ्रीका को लंबे समय से दुनिया को लूटती रही है। यहां का सोना-चांदी और हीरा यूरोप समेत दुनिया के कई देशों में जाता है, लेकिन पश्चिम अफ्रीका में बसा देश बुर्किना फासो इन दिनों ऐसा कदम उठा रहा है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। सोना उसके पास था, लेकिन कमाई विदेशी कंपनियां ले जाती थीं। अब बुर्किना फासो ने खेल पलट दिया है। देश की कई बड़ी सोने की खदानों पर स्थानीय कंपनियों और सरकार ने सीधा कब्जा दे दिया है। राष्ट्रपति इब्राहिम त्राओरे इसे ‘आर्थिक संप्रभुता’ यानी अपनी संपत्ति पर अपना हक बता रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बुर्किना फासो अफ्रीका के बड़े सोना उत्पादक देशों में गिना जाता है। लेकिन दशकों तक यहां का औद्योगिक खनन सेक्टर विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में रहा है। सोना जमीन से निकलता था, लेकिन मुनाफे का बड़ा हिस्सा बाहर चला जाता था। खास तौर से फ्रांस, यूके और कनाडा को। अब सरकार ने इस मॉडल को बदलना शुरू किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2025 के आखिर तक बुर्किना फासो की 15 सक्रिय औद्योगिक सोना खदानों में से 6 ऐसी हो गईं, जिनमें बहुमत हिस्सेदारी बुर्किनाबे कंपनियों की है। इनमें से 3 खदानों पर सरकार की कंपनी का नियंत्रण है। इसे दशकों पुराने विदेशी दबदबे से बड़ा ब्रेक माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रपति इब्राहिम त्राओरे पहले ही साफ कह चुके हैं, ‘हम अपना सोना खुद निकालेंगे। 2023 में राष्ट्रीय गोल्ड रिफाइनरी प्रोजेक्ट लॉन्च करते समय उन्होंने यही संदेश दिया था। सरकार का कहना है कि खनन से मिलने वाला पैसा अब देश के अंदर ही रहेगा और उससे सड़क, उद्योग, इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं को फंड मिलेगा।
बुर्किना फासो सिर्फ खदानों की हिस्सेदारी नहीं बदल रहा, बल्कि औपनिवेशिक दौर से चले आ रहे आर्थिक मॉडल को चुनौती दे रहा है। बात दें बुर्किना फासो कभी फ्रांस की कॉलोनी था। 1890 के दशक से 1960 तक यह फ्रेंच शासन के अधीन रहा। तब इसका नाम अपर वोल्टा था और यह फ्रेंच वेस्ट अफ्रीका का हिस्सा था। 5 अगस्त 1960 को इसे आजादी मिली। बाद में 1984 में राष्ट्रपति थॉमस संकारा ने इसका नाम बदलकर बुर्किना फासो रखा, जिसका मतलब है ‘ईमानदार लोगों की भूमि।’ लेकिन राजनीतिक आजादी के बाद भी आर्थिक ढांचा काफी हद तक विदेशी कंपनियों और पश्चिमी प्रभाव के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। खासकर सोना, जो देश की सबसे बड़ी संपत्तियों में से एक है, उस पर विदेशी कंपनियों का दबदबा बना रहा। इब्राहिम त्राओरे का नाम अचानक दुनिया में नहीं उभरा। वे सेना के एक युवा कैप्टन थे। त्राओरे के समर्थक उन्हें अफ्रीका का नया पैन-अफ्रीकनिस्ट चेहरा बताते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने फ्रांस का प्रभाव कम किया, विदेशी कंपनियों की पकड़ ढीली की और संसाधनों पर देश का हक मजबूत किया, लेकिन आलोचक उन्हें तानाशाही की राह पर बढ़ता नेता मानते हैं। संविधान निलंबित हुआ, संसद भंग हुई, चुनाव टल गए, राजनीतिक दलों पर कार्रवाई हुई, मीडिया और विपक्ष पर दबाव बढ़ा। हाल ही में उन्होंने यह तक कह दिया कि देश में कोई लोकतंत्र नहीं होगा।
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