Trump ने इजराइल के साथ मिलकर जिस मकसद से जंग छेड़ी, उससे वह कोसों दूर
ईरान के साथ यह टकराव अमेरिकी राष्ट्रपति की विरासत को दागदार न कर दे?
वाशिंगटन। ईरान के साथ युद्ध शुरू हुए दो महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस मकसद के साथ यह सैन्य कार्रवाई शुरू की थी, वह अब भी कोसों दूर है। न तो अमेरिका को कोई निर्णायक सैन्य जीत मिली है और न ही ईरान झुकने को तैयार है। हालात ऐसे हैं कि यह गतिरोध अनिश्चित काल तक खिंच सकता है। यह स्थिति न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया के लिए मुसीबत बनती जा रही है। ट्रंप के लिए अब सबसे बड़ी चिंता यह है कि ईरान के साथ यह टकराव उनकी विरासत को दागदार न कर दे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक दोनों पक्ष इस समय अपनी अपनी जिद पर अड़े हैं। ट्रंप और ईरानी नेतृत्व दोनों को ही लग रहा है कि उनका पलड़ा भारी है। ईरान ने बातचीत शुरू करने के लिए एक नया प्रस्ताव भेजा था लेकिन ट्रंप ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद गतिरोध खत्म होने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लिए यह अनसुलझा संघर्ष बेहद डरावना साबित हो सकता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। अमेरिका में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे जनता में गुस्सा है। ट्रंप प्रशासन ने जब ईरान पर हमला किया था, तो उनके लक्ष्य बहुत बड़े थे। वे ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहते थे और उसके परमाणु कार्यक्रम को हमेशा के लिए खत्म करना चाहते थे। अमेरिकी और इजराइली हमलों ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को काफी नुकसान जरूर पहुंचाया है, लेकिन ट्रंप के मुख्य उद्देश्य अभी भी अधूरे हैं। न तो वहां की सरकार बदली और न ही ईरान ने अपने परमाणु हथियारों की राह छोड़ी है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, इस गतिरोध के और गहराने का डर बढ़ता जा रहा है। पिछले हफ्ते पाकिस्तान के जरिए बातचीत की कोशिशें हुई थीं। ट्रंप ने अपने वार्ताकारों की इस्लामाबाद यात्रा रद्द कर दी।
इसके बाद ईरान ने युद्ध रोकने का एक प्रस्ताव दिया था, जिसे ट्रंप ने ठुकरा दिया। तेहरान का प्रस्ताव था कि जब तक युद्ध औपचारिक रूप से खत्म नहीं होता, तब तक परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा टाल दी जाए, साथ ही होर्मुज को फिर से खोलने पर समझौता हो। ट्रंप को यह मंजूर नहीं था क्योंकि वे शुरुआत में ही परमाणु मुद्दे पर ठोस गारंटी चाहते थे। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी ढंग से बंद कर रखा है। दुनिया का पांचवां हिस्सा तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। इसके बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति को बड़ा झटका लगा है। तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर अमेरिकी नागरिकों की जेब पर असर डाल रही हैं। अमेरिका में नवंबर में मिडटर्म चुनाव होने वाले हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी तेल की कीमतें बढ़ती हैं, सत्ताधारी दल को नुकसान होता है। ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 34 फीसदी पर आ गई है, जो उनके कार्यकाल का सबसे निचला स्तर है। पेट्रोल की कीमतें 4 डॉलर प्रति गैलन के पार जा चुकी हैं। अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो रिपब्लिकन पार्टी के लिए कांग्रेस में अपना बहुमत बचाना मुश्किल हो जाएगा। व्हाइट हाउस भले ही कह रहा हो कि ट्रंप के पास पूरा समय है, लेकिन हकीकत में समय उनके खिलाफ चल रहा है।
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