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Myanmar के दुर्लभ खनिज पर ड्रैगन की नजर, विद्रोही गुटों की कर रहा मदद, भारत टेंशन में

Myanmar के दुर्लभ खनिज पर ड्रैगन की नजर, विद्रोही गुटों की कर रहा मदद, भारत टेंशन में

चीन ने संघर्ष-ग्रस्त सीमावर्ती इलाके को वैश्विक भू-राजनीति के केंद्र में बदल दिया

नेपीडा। भारत का पड़ोसी देश म्यांमार में साल 2021 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद से देश गृह युद्ध की चपेट में है। म्यांमार की सत्ता पर काबिज जुंटा सेना और विद्रोही समूहों के बीच झड़पें जारी हैं। इस उथल-पुथल के बीच चीन ने म्यामांर के दुर्लभ खनिज तत्वों पर अपनी नजर जमा रखी है। चीनी ना सिर्फ म्यांमार से खनिज निकाल रहा है बल्कि वहां विद्रोही गुटों को मदद देकर भारत की सीमा को अस्थिर कर रहा हैं। ऐसे में भारत की नजर म्यांमार और वहां चीनी गतिविधियों पर हैं। एक विश्लेषण के मुताबिक उत्तरी म्यांमार के कचीन प्रांत की खदाने हैं। चीन ने इस संघर्ष-ग्रस्त सीमावर्ती इलाके को वैश्विक भूराजनीति के केंद्र में बदल दिया है। म्यांमार के जातीय सशस्त्र गुटों को आर्थिक निर्भरता के जरिए चीन ने अपने नियंत्रण में करते हुए भारत के लिए बॉर्डर पर उसकी मुश्किल को बढ़ा रखा है। म्यांमार की जमीन चीन के लिए भारी दुर्लभ खनिजों का मुख्य स्रोत बन गई है। चीन ने यहां से 2017 से 2024 के बीच 290,000 टन खनिजों का निर्यात किया, जिनकी कीमत 4.2 अरब अमेरिकी डॉलर है। इसका ज्यादातर हिस्सा 2021 के तख्तापलट के बाद निर्यात किया। म्यांमार की सीमाओं पर मौजूद जातीय सशस्त्र संगठनों को चीन अपना हथियार बना रहा है। खासतौर से कचीन और शान प्रांतों में वह इन गुटों का इस्तेमाल कर रहा है। यहां के गुट भोजन, पेट्रोल और खनिजों की बिक्री से मिलने वाले पैसों के लिए चीनी सीमा से व्यापार पर निर्भर हैं। म्यांमार में चीन का दबदबा रातों-रात नहीं बना। यह एक सोची-समझी, लंबी अवधि की रणनीति है, जिसके तहत उसने संघर्ष-प्रवण क्षेत्रों में अपना आर्थिक प्रभाव जमाया और उसे भू-राजनीतिक लाभ में बदल दिया, जबकि भारत का दृष्टिकोण ज़्यादातर धीरे-धीरे आगे बढ़ने वाला और प्रतिक्रियात्मक रहा है।

भारत और म्यांमार के बीच की 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम तक फैली है। यह सीमा विद्रोहियों की गतिविधियों के प्रति संवेदनशील रही है। भारत ने सालों तक सीमा पर अस्थिरता को म्यांमार के सुरक्षा तंत्र के साथ आपसी तालमेल के जरिए नियंत्रित किया, जिससे सीमा पर सशस्त्र गतिविधियों को रोकने में मदद मिलती थी। म्यांमार के 2021 के तख्तापलट ने इस व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर दिया। इससे विद्रोही समूहों को सीमावर्ती इलाकों में अपनी गतिविधि बढ़ाने का मौका मिल गया। इस बदलती स्थिति ने भारत के सुरक्षा तंत्र के लिए एक दीर्घकालिक और कम तीव्रता वाली सुरक्षा चुनौती खड़ी कर दी है। इसके दुष्प्रभाव मुख्य रूप से पूर्वी सीमा के उन हिस्सों पर पड़ रहे हैं, जो पहले से ही संवेदनशील हैं। साथ ही भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी भी बदलती वास्तविकता के अनुरूप ढलने में संघर्ष कर रही है। भारत को नीतिगत दृष्टिकोण में बदलाव की जरूरत है। अब जुड़ाव सिर्फ म्यांमार के केंद्रीय राज्य तक ही सीमित नहीं रह सकता। एक लचीले ढांचे की जरूरत है, जो सुरक्षा और आर्थिक नतीजों को प्रभावित करने वाले तत्वों को भी ध्यान में रखे, क्योंकि इस पूरे क्षेत्र में सत्ता का बंटवारा है।

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