UNSC में सार्थक और व्यापक सुधार की जरुरत, न कि केवल सीमित बदलावों की
-भारत ने अस्थायी सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव को “विफलता की कगार” बताया
जेनेवा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधार को लेकर जारी वैश्विक चर्चा के बीच भारत ने केवल अस्थायी सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है और इसे “विफलता की कगार पर पहुंचा हुआ” बताता है। भारत का कहना है कि विश्व संगठन की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था में सार्थक और व्यापक सुधार की जरुरत है, न कि केवल सीमित बदलावों की। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश ने सोमवार को कहा कि स्थायी सदस्यता का विस्तार किए बिना सुधार करने से पी5 यानी पांच स्थायी सदस्यों- ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस और अमेरिका की फैसला लेने की संरचना में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आएगा। उन्होंने कहा कि समूहों और सदस्य देशों ने वास्तविक और सार्थक बदलाव के लिए लंबे समय तक इंतजार किया है। यदि सुधार केवल अस्थायी सदस्यता तक सीमित रहा, तो यूएनएससी सुधार विफलता की कगार पर पहुंच जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक इटली के नेतृत्व वाला यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस (यूएफसी) समूह, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है, नए स्थायी सदस्यों को जोड़ने का विरोध करता रहा है। भारत का आरोप है कि यह समूह सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में प्रक्रियागत उपायों का इस्तेमाल कर बाधा उत्पन्न करता है। यूएफसी को अनौपचारिक रूप से ‘कॉफी क्लब’ भी कहा जाता है। 1990 के दशक में गठित यह समूह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीटों के विस्तार का विरोध करता रहा है। यूएफसी की प्रमुख रणनीति यह है कि ऐसे वार्ता-पाठ को अपनाने से रोका जाए, जो सुधारों पर ठोस चर्चा का आधार बन सके और प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद करे। उनका कहना है कि बातचीत का टेक्स्ट बनने से पहले आम सहमति होनी चाहिए, जो बातचीत से आम सहमति बनने के विचार के बिल्कुल उलट है। भारतीय प्रतिनिधि हरीश ने कहा कि जब तक हर मुद्दे पर सहमति न बन जाए, तब तक किसी भी मुद्दे पर सहमति नहीं मानी जाएगी। जैसी सोच को प्रगति में बाधा नहीं बनने दिया जाना चाहिए। यूएफसी का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि यथास्थितिवादी पक्षों ने इस तर्क का इस्तेमाल अपने हित में किया है और इस प्रकार सुरक्षा परिषद में मौजूद असमानताओं को और मजबूत किया है।
उन्होंने कहा कि आईजीएन, यूएन की दूसरी प्रक्रिया से बिल्कुल अलग नहीं हो सकता, जहां बातचीत एक टेक्स्ट के आधार पर होती है। इसलिए, हम सह-अध्यक्षों से अपील करते हैं कि वे एक टेक्स्ट बनाने में लीड लें, जिसमें स्पष्ट तौर पर तय माइलस्टोन और टाइमलाइन हों। उन्होंने कहा कि जहां महासभा संयुक्त राष्ट्र के वास्तविक लोकतांत्रिक सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं सुरक्षा परिषद अपनी मूल संरचना और कार्यप्रणाली के कारण उससे मौलिक रूप से अलग है। उन्होंने कहा कि चार्टर की मौलिक संरचना के कारण, संयुक्त राष्ट्र महासभा के विपरीत, राज्यों की संप्रभु समानता का सिद्धांत सुरक्षा परिषद में पूर्ण रूप से लागू नहीं होता। आईजीएन के सह-अध्यक्षों द्वारा तैयार किए गए तथाकथित “एलिमेंट्स पेपर” की आलोचना करते हुए हरीश ने कहा कि यह दस्तावेज विभिन्न विचारों को समेकित रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करता है, लेकिन इसमें स्थायी सदस्यता की अवधारणा पर और स्पष्टीकरण की जरुरत बताई है। उन्होंने संकेत दिया कि ऐसा दृष्टिकोण सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के बजाय उसे लंबा खींच सकता है। “इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र चार्टर पूरी तरह स्पष्ट है और इसमें किसी प्रकार के भ्रम की गुंजाइश नहीं है। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 23 साफ तौर पर यूएनएससी सदस्यों को दो कैटेगरी में बांटता है- स्थायी और अस्थायी। इसलिए, स्थायी सीट की परिभाषा को और विस्तार में बताने की जरूरत नहीं है।
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