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  • Wednesday, 14 January 2026
Pakista की जनता को नहीं मिल रही दो जून की रोटी, महंगाई ने तोड़ी जनता की कमर

Pakista की जनता को नहीं मिल रही दो जून की रोटी, महंगाई ने तोड़ी जनता की कमर

इस्लामाबाद। इन दिनों पाकिस्तान बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है। यहां आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। खाने का सामान इतना महंगा है कि लोग खरीद नहीं पा रहे हैं। बीते कुछ समय से जारी राजनीतिक अस्थिरता भी इस संकट को आर ज्यादा बढ़ा रही है। आम खाने-पीने की चीजों, आटा, दाल, चीनी से लेकर चावल तक की कीमतों में हाल के महीने में बेतहाशा बढोतरी देखी गई है। जिससे कम आय वाले परिवारों के लिए परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। एक तरफ कीमतें बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर कई कंपनियों और फैक्ट्रियों ने भी छंटनी की है। जिससे बेरोजगारी बढ़ रही है और इससे हालात और ज्यादा पेचीदा हो रहे हैं।


पाकिस्तान के बिगड़ते आर्थिक हालात पर एक रिपोर्ट की है। इसमें उन्होंने लाहौर के एक दिहाड़ी मजदूर आसिफ मसीह के बारे में बताया है, जिसके सामने बीवी और पांच बच्चों को पालने की चुनौती है। 45 साल का आसिफ उन 7,00,000 श्रमिकों में से एक है, जो पाकिस्तान में हाल के सालों में बंद हुए 1,600 कपड़ा कारखानों में से एक में काम करता था। कारखाना बंद होने के बाद उसके पास काम नहीं है। कपड़े बनाने वाली एक फैक्ट्री में इस साल की शुरुआत में नौकरी से निकाले जाने के बाद आसिफ मसीह कभी ऑटोरिक्शा चलाकर तो कभी दिहाड़ी पर कोई काम कर अपने बच्चों के लिए खाना जुटा रहे हैं।


आसिफ लाहौर के योहानाबाद के औद्योगिक क्षेत्र में एक छोटे कमरे में रहते हैं। उनकी पत्नी शमीम आसिफ ने बताया कि जीवनयापन की बढ़ती लागत का उनके परिवार पर बहुत असर हुआ है। आसिफ की तीन बेटियों और दो बेटे हैं, जिनमें से कोई भी स्कूल नहीं जाता है। आसिफ का कहना है कि पहले हम 500 पाकिस्तानी रुपए में अपने घर का खर्च चला लेते थे लेकिन फिलहाल मंहगाई के चलते हालात ये हैं कि सात आदमियों के हमारे परिवार को भोजन पकाने के लिए ही हर दिन करीब 1,500 रुपए चाहिए। ऐसे में बच्चों को स्कूल भेजने की तो हम कैसे सोच सकते हैं। आसिफ मसीह पाकिस्तान के मौजूदा आर्थिक संकट से प्रभावित उन लाखों लोगों के हालात का आईना हैं, जो हर रोज दो वक्त की रोटी जुटाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।


अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की ओर से हाल ही में एक और राहत पैकेज पाकिस्तान को मिला है। 1958 के बाद से 23वां राहत पैकेज है। इसके बावजूद देश के हालात संभलते नहीं दिख रहे हैं। मंहगाई सिर्फ खाद्य तक सीमित नहीं है। ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी से उद्योगपतियों को भी मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है। अर्थशास्त्री और पूर्व वित्त मंत्री मिफ्ताह इस्माइल का कहना है कि बीते कुछ समय में आटा, मांस और चावल जैसी आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमत कई बार दोगुनी से भी अधिक हो गई है। ये गरीब और श्रमिक वर्ग के लिए विनाशकारी स्थिति है।

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