Shitala Mata Temple का इतिहास - ग्वालियर की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र
ग्वालियर/ ग्वालियर जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर, चीनौर रोड एवं सांतऊ गांव के पास घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच एक खोह मेंआस्था की माता विराजी हैं। जो सांतऊ का सिद्ध शीतला माता मंदिर के नाम से है। मंदिर का निर्माण 1669 में कराया गया था।
पौराणिक कथा:
मान्यता है कि मंदिर के प्रथम भक्त सांतऊ गांव के गजाधर थे। वे रोज भिंड जिले की गोहद तहसील के खरौआ गांव के प्राचीन देवी मंदिर में गाय के दूध से माता का अभिषेक करने जाते थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी कन्या के रूप में प्रकट हुईं और अपने साथ चलने को कहा। गजाधर ने सांतऊ लौटकर माता का आह्वान किया तो देवी गांव से बाहर पहाड़ी पर विराजमान हो गईं। उसी स्थान पर मंदिर बना। आज भी गजाधर के वंशज ही पूजा करते हैं - वर्तमान महंत नाथूराम उनकी पांचवी पीढ़ी हैं।
गुर्जर समाज और डकैतों की आराध्य:
यह मंदिर अंचल के गुर्जर समाज की अगाध श्रद्धा का केंद्र है। मन्नत पूरी होने पर पीतल के घंटे चढ़ाने की परंपरा है। 70-80 के दशक तक यह पूरा इलाका घना बीहड़ था, इसलिए इसे 'डकैतों की आराध्य देवी' भी कहा जाता था। चंबल के कुख्यात डकैत मोहर सिंह, मलखान सिंह, माधौ सिंह और दयाराम-रामबाबू गड़रिया गैंग के सदस्य यहां छिपते थे और माता से अभय वरदान मांगते थे, मन्नत पूरी होने पर बड़े-बड़े घंटे चढ़ाते थे।
पुलिस ने भी मांगी मन्नत:
एंटी डकैत मूवमेंट के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रिटायर्ड अफसर अशोक भदौरिया के अनुसार, दयाराम-रामबाबू गड़रिया गैंग के खात्मे के लिए पुलिस को भी मां शीतला के दरबार में मन्नत मांगनी पड़ी थी। पुलिस ने वादा किया था कि गैंग का खात्मा हुआ तो डकैतों से भी बड़ा घंटा चढ़ाएंगे। गैंग के एनकाउंटर के बाद पुलिस ने खुद मंदिर में भारी घंटा चढ़ाया। आज यह मंदिर आम श्रद्धालुओं के साथ-साथ पुलिस की भी आस्था का केंद्र है। यहां चैत्र और शारदीय नवरात्रि में पैदल दर्शन करने की परंपरा है, हर सोमवार को मेला लगता है और सत्यनारायण कथा का विशेष महत्व है।
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