Iran शांति समझौते पर बढ़ी तकरार: वेंस ने इजरायली नेताओं को लताड़ा
वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते ने उसके दशकों पुराने करीबी सहयोगी इजरायल के साथ गहरे कूटनीतिक दरार पैदा कर दी है। इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम के बाद, अमेरिकी उप राष्ट्रपति जे. डी. वेंस ने इजरायली नेताओं को इस डील की सार्वजनिक आलोचना करने पर कड़ी फटकार लगाई है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है। वेंस ने इजरायल को वास्तविकता का सामना करने की नसीहत दी है, यह संकेत देते हुए कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में इजरायल के पास अमेरिका जैसा सहानुभूति रखने वाला सहयोगी शायद ही कोई और है। व्हाइट हाउस में मीडिया से बात करते हुए वेंस ने उन अटकलों को भी खारिज किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इजरायल की समस्याओं का कारण हैं। उन्होंने कहा, इजरायल की समस्या डोनाल्ड ट्रंप नहीं हैं। अगर वहां किसी को ऐसा लगता है कि उसे जागना चाहिए और वास्तविकता को समझना चाहिए। हालांकि, वेंस ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सार्वजनिक आलोचना का उल्लेख नहीं किया, जो इस डील पर सीधे तौर पर मुखर नहीं हुए हैं, लेकिन उनका स्पष्ट इशारा इजरायली कैबिनेट के कुछ सदस्यों की ओर था।
अमेरिकी उप राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान के साथ शांति समझौते को लेकर अमेरिका और इजरायल के रिश्ते बेहद खटास भरे दौर से गुजर रहे हैं। इजरायल का मानना है कि यह समझौता ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने, क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने और अस्थिरता फैलाने की अनुमति देगा, जिससे उसकी सुरक्षा को सीधा खतरा होगा। यहूदी राष्ट्र लंबे समय से ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता रहा है और किसी भी ऐसे समझौते का विरोध करता रहा है जो तेहरान की सैन्य क्षमताओं को प्रभावी ढंग से सीमित न करे।दरअसल, दोनों देशों के बीच इस विवाद की जड़ फरवरी 28 को हुए एक संयुक्त सैन्य अभियान में है, जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला किया था। उस समय दोनों देशों को उम्मीद थी कि कुछ ही समय में ईरान घुटने टेक देगा और एक निर्णायक जीत हासिल होगी। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ और युद्ध लंबा खिंचने लगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो लंबे युद्धों के खिलाफ रहे हैं, ईरान युद्ध को जल्द से जल्द खत्म करना चाहते थे। इसके विपरीत, इजरायल का मानना था कि ईरान पर सैन्य दबाव जारी रखना चाहिए और उसे पूरी तरह से कमजोर किए बिना नहीं रुकना चाहिए। जब 8 अप्रैल को अस्थायी संघर्ष-विराम की घोषणा की गई, तब भी नेतन्याहू ने इसकी कड़ी आलोचना की थी, यह तर्क देते हुए कि इससे ईरान को फिर से संगठित होने का मौका मिलेगा। यहीं से दोनों पक्षों के बीच रणनीतिक दृष्टिकोणों में विवाद की नींव पड़ी, जो अब खुलकर सामने आ गया है। बाद में जब ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौता हुआ, तो इजरायल में इसे लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन देखे गए। इजरायल के रक्षा मंत्री ने समझौते की आलोचना करते हुए यहां तक कहा है कि इजरायल लेबनान में अपने अभियानों को जारी रखेगा, चाहे अमेरिका का रुख कुछ भी हो, जिससे दोनों देशों के बीच मतभेदों की गहराई और स्पष्ट हो गई है।
यह कूटनीतिक दरार अमेरिका और इजरायल के ऐतिहासिक रूप से मजबूत संबंधों के लिए एक गंभीर चुनौती पेश करती है। दशकों तक, अमेरिका इजरायल का सबसे बड़ा समर्थक और सहयोगी रहा है, विशेष रूप से रक्षा और सुरक्षा के मामलों में। हालांकि, इस नए समझौते पर मतभेद ने दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग को कमजोर कर दिया है, जिससे पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावना है।
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