दुनिया में क्यों घट रही पारसियों की Population, शादी के तौर-तरीके इसकी सबसे बड़ी वजह
नई दिल्ली। देश में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) लागू हो गया है। इसके तहत तीन पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर मुस्लिम शरणार्थियों हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसियों को भारतीय नागरिकता मिल सकेगी। पारसी समुदाय भी इसमें से एक है। पारसी धर्म के लोग बहुत कम ही खबरों में रहते हैं, या किसी उथल-पुथल का हिस्सा बनते हैं। साल 2001 की जनगणना में पारसियों की आबादी 69,601 थी, जबकि साल 2011 में घटकर 57,264 रह गई। हालात ये हैं कि मिनिस्ट्री ऑफ माइनोरिटी अफेयर्स ने जिओ पारसी स्कीम शुरू की। इस मुहिम का मकसद समुदाय की कम होती जनसंख्या को बचाना और उनकी मदद करना है। वहीं पूरी दुनिया में लगभग 2 लाख पारसी ही बाकी हैं। वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू का मानना है कि इनकी संख्या सवा लाख से ज्यादा नहीं है। पारसी समुदाय भारत के अलावा ईरान, अमेरिका, इराक, उजबेकिस्तान, और कनाडा में बसा हुआ है। पाकिस्तान में भी हजार के आसपास पारसी माने जाते हैं। पारसी धर्म दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से है। इसकी स्थापना जरथुस्त्र ने प्राचीन ईरान में 3500 साल पहले की थी। काफी समय तक ये ताकतवर धर्म के रूप में रहा। यहां तक कि ईरान का ये आधिकारिक मजहब था, जो आज मुस्लिम-बहुल है। इसे मानने वालों को पारसी या जोराबियन कहते हैं।
6वीं सदी तक ये लोग वहां काफी संख्या में थे। इसके बाद ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई, जिसमें लोगों पर धर्म बदलने का दबाव बनाया गया। धर्मांतरण के लिए राजी न होने वालों को मार दिया जाता। तभी पारसी समुदाय के लोग दुनियाभर में पलायन करने लगे। तभी इनका भारत आना हुआ। बड़ी संख्या में पारसी पूर्वी भारत की तरफ आने लगे। गुजरात के वलसाड़ से होकर मुंबई भी पहुंचे। इन दिनों ज्यादातर पारसी मुंबई में रहते हैं। माना जाता है कि मुंबई को असल में पारसियों की मेहनत ने ही बसाया। वहां कई इलाके हैं, जहां पारसी बस्तियां हैं और पारसी खानपान की झलक जहां दिखेगी। वे काफी पढ़े-लिखे होते हैं, और बिजनेस में भी जल्दी तरक्की कर जाते हैं। मुंबई में बड़े बिजनेस किसी न किसी पारसी परिवार के हैं।
आखिर क्यों घट रही आबादी
इसके लिए हमें उनकी शादी-ब्याह के तौर-तरीकों को समझना होगा। कहा गया कि फिलहाल शादी की उम्र के 30 प्रतिशत पारसी अविवाहित हैं। जो शादी कर चुके, उनमें भी बच्चा देर से करने या न करने का चलन है। इससे समुदाय की फर्टिलिटी रेट 0.8 है। इस हिसाब से हर साल अगर 3 सौ पारसी बच्चे जन्म लेते हैं, तब वहीं 8 सौ लोगों की मौत हो जाती है।
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