
ये क्या हुआ? अमेरिकी जनरल ने President Trump की हां में हां नहीं की तो कर दिया बर्खास्त
वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यशैली काफी अलग है। कब कौन सा निर्णय ले बैठें कोई नहीं जानता। हाल ही में उन्होंन एक जनरल को सिर्फ इसलिए बर्खास्त कर दिया कि उन्होंने ट्रंप की हां में हां नहीं मिलाई थी। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने शुक्रवार को तीन बड़े अधिकारियों को उनके पद से हटा दिया। सबसे बड़ा नाम है लेफ्टिनेंट जनरल जेफ्री क्रूज का है, जो अमेरिकी डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) के प्रमुख थे। इसके अलावा वाइस एडमिरल नैन्सी लैकोरे (नेवी रिजर्व की चीफ) और रियर एडमिरल मिल्टन सैंड्स (नेवी सील और स्पेशल वॉरफेयर कमांड के प्रमुख) को भी बर्खास्त कर दिया गया। दरअसल, डीआईए की एक शुरुआती रिपोर्ट में कहा गया था कि इन हमलों से ईरान का परमाणु कार्यक्रम सिर्फ कुछ महीनों के लिए धीमा हुआ है। यह बात राष्ट्रपति ट्रंप के दावों के उलट थी। ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू का कहना था कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम ‘पूरी तरह तबाह’ हो गया है। रिपोर्ट लीक होने के बाद ट्रंप बेहद नाराज हो गए। माना जा रहा है कि यही वजह जनरल क्रूज की बर्खास्तगी का सबसे बड़ा कारण बनी। बता दें कि यह कोई पहला मामला नहीं है। हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने कई वरिष्ठ अधिकारियों को उनके पद से हटा दिया है। पेंटागन के मुताबिक एयरफोर्स के टॉप अफसर जनरल डेविड ऑल्विन ने अचानक दो साल पहले ही रिटायरमेंट की घोषणा कर दी। जनरल सीक्यू ब्राउन जूनियर, जो ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन थे, उन्हें भी हटा दिया गया। नौसेना के प्रमुख, एयरफोर्स के डिप्टी चीफ और तीनों सेनाओं के टॉप लॉ ऑफिसर्स को भी बाहर का रास्ता दिखाया गया।
अप्रैल में एनएसए के प्रमुख जनरल टिम हॉग और नाटो की वरिष्ठ अधिकारी वाइस एडमिरल शोशाना चैटफील्ड को भी हटा दिया गया। पेंटागन ने इस बर्खास्ती पर कोई टिप्पणी नहीं की है। वहीं विपक्षी नेताओं का आरोप है कि ट्रंप प्रशासन अब खुफिया एजेंसियों और सेना से सिर्फ वही राय चाहता है, जो उनके राजनीतिक हितों के अनुकूल हो। सीनेटर मार्क वॉर्नर ने कहा, ‘एक और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी की बर्खास्तगी से साफ है कि ट्रंप प्रशासन खुफिया रिपोर्ट को देश की सुरक्षा नहीं बल्कि वफादारी की कसौटी मान रहा है।’ हाउस इंटेलिजेंस कमेटी के डेमोक्रेटिक नेता जिम हाइम्स ने भी सवाल उठाए और कहा, ‘अगर सरकार साफ वजह नहीं बताती तो इसे एक राजनीतिक फैसला ही माना जाएगा, जो खुफिया एजेंसियों में डर का माहौल बनाने के लिए किया गया है।
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