विश्व शांति का नया सूत्रधार? रूस-यूक्रेन-ईरान ने PM Modi से लगाई उम्मीद
नई दिल्ली। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की भूमिका संभावित शांतिदूत के रूप में सामने आ रही है। हाल ही में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से हुई मुलाकातों ने अटकलों को जन्म दिया है कि भारत, रूस-यूक्रेन और ईरान-अमेरिका के बीच जारी युद्धों को रोकने में मध्यस्थता कर सकता है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया, विशेषकर चीनी मीडिया, इस संभावना पर गहन चर्चा कर रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, इन तीनों देशों के बीच भारत को एक संभावित पुल के रूप में देखा जा रहा है। दिल्ली के सभी संबद्ध देशों की राजधानियों में मजबूत संपर्क हैं, और ऐसा कोई अन्य देश नहीं है जो सभी पक्षों से एक साथ सीधे संवाद कर सके। हालांकि, विशेषज्ञों का तर्क है कि मात्र पहुंच होने का मतलब हमेशा दबाव बनाने की ताकत नहीं होता और मध्यस्थता के लिए भारत की वास्तविक इच्छा भी मायने रखती है। किर्गिस्तान के बिश्केक में हुए शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन से यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि युद्ध में बिताया गया हर दिन मानवता को पीछे धकेलता है और भारत शांति प्रयासों का लगातार समर्थन करता रहेगा। इसी बीच, विदेश मंत्री जयशंकर ने कीव में यूक्रेनी राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की से मुलाकात कर युद्ध रुकवाने में मदद की पेशकश की।
सबसे दिलचस्प ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियन का अनुरोध था, जिन्होंने मोदी से भारत के व्यापक संपर्कों का उपयोग करके अन्य पक्षों को संघर्ष से दूर रहने में मदद करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि हमारा मानना है कि हमारे सामने आने वाली समस्याओं का समाधान बातचीत और सहयोग में निहित है और असुरक्षा तथा संघर्ष को फैलने से रोकने के लिए सभी उपलब्ध क्षमताओं का उपयोग किया जाना चाहिए। यह बयान भारत की संभावित भूमिका को और मजबूत करता है। विश्लेषकों का मानना है कि इन मुलाकातों से भारत की नई भूमिका सामने आई है। उनका कहना है कि भारत में मॉस्को, तेहरान और पश्चिम सभी से एक साथ बात करने की दुर्लभ क्षमता है। यह पहुंच वास्तविक है, लेकिन ठोस समझौतों में बदलना चुनौतीपूर्ण है। मध्यस्थता तभी सफल होती है जब संघर्षरत पक्ष स्वयं समाधान चाहते हों और मध्यस्थ पर विश्वास करते हों। भारत ने संघर्षों में किसी भी पक्ष का समर्थन करने से लगातार परहेज किया है, जिससे उसकी विश्वसनीयता बढ़ी है। यदि भारत अपनी मौजूदा अध्यक्षता का सही उपयोग करता है, तब इसके अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण परिणाम हो सकते हैं, खासकर ब्रिक्स जैसे मंचों पर जो तनावपूर्ण दुनिया के लिए शांति, स्थिरता और आर्थिक सहयोग के प्रतीक के रूप में देखे जाते हैं। भारत के लिए चुनौती है कि वह बिना किसी गुट का मोहरा बने, सभी पक्षों से बात कर सके और दुनिया की जंग रुकवाने में वाकई कोई भूमिका निभा सके।
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