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  • Sunday, 11 October 2026
भक्षक में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के तौर पर Sanjay Mishra को मिला अवार्ड

भक्षक में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के तौर पर Sanjay Mishra को मिला अवार्ड

मुंबई। बॉलीवुड अभिनेता संजय मिश्रा को इस साल 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में अपने तीन दशक लंबे करियर का पहला नेशनल अवॉर्ड मिला। संजय मिश्रा को यह सम्मान फिल्म भक्षक में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के तौर पर दिया गया, जिसमें उन्होंने एक पत्रकार का किरदार निभाया था। संजय मिश्रा ने आज अपने शानदार अभिनय से दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाई है। उनके जन्मदिन के अवसर पर, हम उनके जीवन के कुछ ऐसे अनसुने पहलुओं से रूबरू होते हैं, जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। 6 अक्टूबर, 1963 को उत्तर प्रदेश के धार्मिक शहर वाराणसी में जन्मे संजय मिश्रा ने अपनी कला के प्रति रुझान के चलते दिल्ली के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश लिया। 1989 में वहां से अभिनय की बारीकियां सीखने के बाद, उन्होंने थिएटर और छोटे पर्दे से अपने अभिनय की यात्रा शुरू की।


बड़े पर्दे पर उनकी शुरुआत फिल्म ओह डार्लिंग! ये है इंडिया! से हुई। इसके बाद सत्या, दिल से.., वजूद और फिर भी दिल है हिंदुस्तानी जैसी फिल्मों में छोटे लेकिन यादगार किरदारों में वह नजर आए। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को एक ऐसे बहुमुखी अभिनेता के रूप में स्थापित किया, जो गोलमाल, धमाल, वध, भूल भुलैया और आँखों देखी जैसी फिल्मों में किसी भी किरदार को जीवंत कर सकते हैं। हालांकि, उनके करियर की गाड़ी जब तेजी से दौड़ रही थी, तब उनकी निजी जिंदगी में एक ऐसा भूचाल आया जिसने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया।


अपने पिता के निधन के गहरे सदमे से वे उबर नहीं पाए और उन्होंने अभिनय की दुनिया से हमेशा के लिए किनारा करने का फैसला कर लिया। मुंबई की चकाचौंध और ग्लैमर से दूर, संजय मिश्रा सीधे ऋषिकेश चले गए। वहां उन्होंने अपनी पहचान छुपाकर एक साधारण ढाबे पर काम करना शुरू कर दिया, जहां वे आम लोगों के लिए ऑमलेट बनाते थे। यह उनके लिए बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण दौर था। दिलचस्प बात यह थी कि कुछ लोग उन्हें पहचान लेते थे, लेकिन वह अपनी पहचान छिपाकर खुद को उस मशहूर अभिनेता का हमशक्ल बताते थे। उनकी किस्मत में कुछ और ही लिखा था। फिल्म निर्देशक रोहित शेट्टी ने उन्हें एक बार फिर फिल्मों में लौटने के लिए मनाया और उन्हें फिल्म ऑल द बेस्ट में काम करने का मौका दिया। यह फैसला उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ और उनकी गाड़ी एक बार फिर पटरी पर आ गई।

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