Richa Chadha ने जताई इंडिपेंडेंट सिनेमा के भविष्य पर चिंता
मुंबई। अक्सर विभिन्न सामाजिक और फिल्मी मुद्दों पर एक्ट्रेस और प्रोड्यूसर ऋचा चड्ढा खुलकर अपनी राय रखती नजर आती हैं। हाल ही में अभिनेत्री ने इंडिपेंडेंट सिनेमा के भविष्य पर गहरी चिंता व्यक्त की है, आखिर इंडिपेंडेंट फिल्ममेकर्स लगातार कमर्शियल एक्टर्स को क्यों कास्ट करते हैं? अभिनेत्री का मानना है कि ऐसे कलाकार उन कहानियों के लिए न तो बॉक्स-ऑफिस पर दर्शकों को आकर्षित कर पाते हैं और न ही किसी इंडिपेंडेंट फिल्म को प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल्स में कोई विशेष साख दिला पाते हैं। उन्होंने एक बयान में कहा, अगर कोई एक्टर शुक्रवार को आपकी फिल्म को थिएटर में ओपनिंग नहीं दिला पाता और न ही फेस्टिवल्स में कोई खास वजन जोड़ पाता है, तो फिर एक इंडिपेंडेंट फिल्म में उसे कास्ट करने का आखिर फायदा क्या है? यह सवाल सीधे तौर पर इंडिपेंडेंट फिल्ममेकिंग की कास्टिंग रणनीतियों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। ऋचा चड्ढा ने स्पष्ट किया कि वह किसी पर कोई आरोप नहीं लगा रही हैं, लेकिन उन्होंने ट्रेंड या प्रशिक्षित एक्टर्स के महत्व पर जोर दिया, जो कमर्शियल सितारों की तुलना में इंडिपेंडेंट फिल्मों के लिए कहीं अधिक उपयुक्त होते हैं। उनके अनुसार, प्रशिक्षित कलाकारों के साथ कम से कम यह भरोसा रहता है कि उनकी परफॉर्मेंस की क्वालिटी बनी रहेगी, जो फिल्म की कलात्मक अखंडता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ऋचा ने कहा कि इंडी फिल्मों के पीछे भी अक्सर कमर्शियल सोच होती है, लेकिन कुछ कहानियों को भीड़ खींचने के लिए हमेशा इतने बड़े चेहरों की जरूरत नहीं होती। ऐसे में, एक ऐसे एक्टर को हायर करना ज्यादा किफायती होता है जो कम बजट में भी फिल्म को साख दिला सके और उसके साथ आने वाले लोगों का खर्च भी न बढ़ाए, जिससे फिल्म का कुल बजट नियंत्रण में रहे। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, किसी भी एक्टर की काबिलियत या अहमियत को कम न करते हुए, मेरा मकसद यह है कि अगर इंडी फिल्मों को 2026 में सचमुच टिके रहना है, तो हमें यह समझना और सीखना होगा कि दर्शक अच्छी कहानियां देखना चाहते हैं, ऐसे काबिल एक्टर्स के साथ जो बजट पर भारी न पड़ें। ऋचा ने इस बात पर जोर दिया कि इंडिपेंडेंट सिनेमा की बुनियाद हमेशा से ही रिस्क लेने, असलियत और मजबूत कहानी कहने पर टिकी रही है।
उन्होंने कहा, इंडी फिल्मों का मकसद नई आवाजों, एक्टर्स, लेखकों और टेक्नीशियन्स को सामने लाना होता है, जो फिल्म में कुछ नयापन और ईमानदारी ला सकें। जब फिल्म मेकर्स कमर्शियल वैल्यू के भ्रम में कास्टिंग के मामले में समझौता करते हैं, तो फिल्म अपनी रूह खो देती है और अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है। एक्ट्रेस ने भारतीय सिनेमा के इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि 1980 के दशक में हमारे यहां इंडी सिनेमा का एक जबरदस्त दौर था, और फारूक शेख, अमोल पालेकर, शबाना आजमी जैसे दिग्गज एक्टर्स अपने आप में बड़े सितारे थे। उन्होंने मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि आज वह जगह पूरी तरह से खत्म हो चुकी है, जहां इंडिपेंडेंट सिनेमा अपने दम पर स्टार पैदा कर सके। ऋचा ने चेतावनी दी कि अगर पूरी इंडस्ट्री सिर्फ 5 बड़े मेल एक्टर्स के इशारे का इंतजार करती रहेगी, जो पहले से ही बहुत थके हुए और बिजी हैं, और जिनके कंधों पर आप अपनी फिल्में चलाना चाहते हैं, तो आपको मेरी तरफ से ऑल द बेस्ट क्योंकि इसका सीधा सा मतलब है कि फिल्मों का प्रोडक्शन बहुत कम हो जाएगा और नए विचारों को मौका नहीं मिलेगा।
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