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वेतन असमानता पर Pallavi Joshi का छलका दर्द

वेतन असमानता पर Pallavi Joshi का छलका दर्द

  • बताई 90 के दशक की कड़वी सच्चाई

मुंबई। अभिनेत्री और प्रोड्यूसर पल्लवी जोशी ने 80 और 90 के दशक में भारतीय टेलीविजन और सिनेमा में अपने अभिनय से एक मजबूत पहचान बनाई। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और प्रतिभा के दम पर टीवी के छोटे पर्दे से लेकर बड़े पर्दे तक का सफर तय किया। हालांकि, इस शानदार करियर के दौरान उन्हें वेतन असमानता जैसी कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ा, जिसे लेकर पल्लवी जोशी ने हाल ही में अपने एक साक्षात्कार में अपने दर्द को साझा किया। पल्लवी जोशी ने इस बात पर जोर दिया कि 90 के दशक में, जब वह अपने करियर के चरम पर थीं और बेहद लोकप्रिय थीं, तब भी उन्हें पुरुष कलाकारों की तुलना में काफी कम वेतन मिलता था। उन्होंने बताया, उस समय मैं टीवी की सबसे ज्यादा फीस पाने वाली अभिनेत्रियों में से एक थीं, लेकिन इसके बावजूद मेरे साथ काम करने वाले पुरुष कलाकारों की तुलना में मेरी कमाई काफी कम थी। यह टिप्पणी उस समय की इंडस्ट्री में व्याप्त लैंगिक वेतन अंतर की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करती है, जहां महिला कलाकारों की लोकप्रियता और काम के बावजूद उन्हें समान महत्व नहीं दिया जाता था।


अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए पल्लवी जोशी ने एक विशेष घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया, एक समय ऐसा भी था जब एक मैगजीन के कवर पेज पर मेरी और अभिनेता शेखर सुमन की तस्वीर एक साथ छपी थी। उस दौर में हम दोनों टीवी के सबसे लोकप्रिय और सबसे ज्यादा फीस पाने वाले कलाकारों में गिने जाते थे। लेकिन सच्चाई यह थी कि शेखर सुमन को उस समय मेरी तुलना में लगभग दोगुनी फीस मिलती थी। यह किस्सा अपने आप में उस दौर की स्थिति को उजागर करता है कि कैसे महिला कलाकारों को बराबर काम, लोकप्रियता और स्टारडम होने के बावजूद पुरुष सहकलाकारों की तुलना में कम भुगतान किया जाता था। पल्लवी ने इसे इंडस्ट्री में उस समय एक सामान्य बात बताया, जिस पर ज्यादा चर्चा या सवाल नहीं उठाए जाते थे। उन्होंने कहा, भले ही मुझे उस समय की सबसे सफल और ज्यादा फीस पाने वाली अभिनेत्री माना जाता था, लेकिन वास्तविकता यह थी कि पुरुष सहकलाकारों की तुलना में मेरी कमाई हमेशा कम ही रही। यह अनुभव उनके लिए एक सोचने वाला विषय था और उन्होंने इसे उस समय चुपचाप स्वीकार किया, क्योंकि उस दौर में इस तरह के मुद्दों पर खुलकर बात करने का चलन नहीं था। उस समय वेतन असमानता को एक सामान्य और अपरिहार्य उद्योग मानक के रूप में देखा जाता था।

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