मक्का रक्षा समझौते से Pakistan देख रहा हसीन सपने
इस्लामाबाद। तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते का मसौदा सामने आने के बाद पाकिस्तान इसे भारत के खिलाफ एक बड़ी कूटनीतिक जीत और सुरक्षा ढाल के रूप में पेश कर रहा है। समझौते के आर्टिकल 2 में कहा गया है कि किसी एक सदस्य देश पर बाहरी हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, कई विश्लेषक इसे केवल एक कूटनीतिक छलावा मान रहे हैं, क्योंकि इसमें सैन्य मदद की कोई ठोस गारंटी नहीं दी गई है। समझौते के मुताबिक, हर देश अपनी क्षमता और संसाधनों के हिसाब से ही मदद तय करेगा, जिसका सीधा मतलब है कि युद्ध में सेना उतारना अनिवार्य नहीं होगा।
भारत जैसे परमाणु शक्ति संपन्न देश के सामने यह समझौता पूरी तरह बेअसर साबित हो सकता है। सऊदी अरब के भारत के साथ गहरे व्यापारिक संबंध हैं, जिनका सालाना व्यापार 40 अरब डॉलर से अधिक है, और वह अपने महत्वाकांक्षी विजन 2030 के लिए भारत की तकनीक और कार्यबल पर निर्भर है। दूसरी ओर, तुर्किये नाटो की पाबंदियों से बंधा है और अपनी आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में दोनों देशों का भारत के खिलाफ पाकिस्तान के समर्थन में सेना उतारना लगभग नामुमकिन है।
समझौते का आर्टिकल 1, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं की रक्षा की बात कही गई है, पाकिस्तान के कश्मीर एजेंडे पर एक बड़ा कानूनी तमाचा है। जम्मू-कश्मीर में भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं, बल्कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) है। यदि भारत सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ पाक अधिकृत कश्मीर में सैन्य कार्रवाई करता है, तो इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन नहीं माना जाएगा, और मक्का पैक्ट का आर्टिकल 2 पाकिस्तान के बचाव में लागू नहीं हो पाएगा। हालांकि, समझौते के कुछ अनुच्छेद जैसे आर्टिकल 7 (रक्षा तकनीक), 9 (खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान) और 10 (युद्धकाल में हथियार, गोला-बारूद और ईंधन मुहैया कराना) भारत के लिए चिंता का सबब बन सकते हैं। पाकिस्तान की युद्ध लड़ने की क्षमता को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए सऊदी अरब द्वारा तेल आपूर्ति भारत के लिए एक चुनौती हो सकती है, जिसके लिए भारत को पहले से रणनीति तैयार रखनी होगी।
पाकिस्तान का आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ने का दावा हास्यास्पद है, क्योंकि वह खुद वैश्विक आतंकवाद की नर्सरी रहा है। भारत ऐसे पाखंड को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उजागर कर रहा है। भारत ने पहले ही ऐसे गठबंधनों का मुकाबला करने के लिए कूटनीतिक बिसात बिछा रखी है, जिसमें ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ मजबूत त्रिकोण बनाना, यूएई से रणनीतिक रिश्ते मजबूत करना और अरब सागर में भारतीय नौसेना का दबदबा कायम रखना शामिल है। भारत के लिए यह समझौता डरने का नहीं, बल्कि अपनी रक्षा आत्मनिर्भरता, एंटी-ड्रोन ग्रिड को मजबूत करने और रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बढ़ाने का अवसर है।
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