केवल degree नहीं, बच्चों को कौशल और सही दिशा भी दें
ग्वालियर/किसी भी विद्यार्थी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ वह होता है, जब वह स्कूल की शिक्षा पूरी कर कॉलेज में प्रवेश करता है। इसी समय उसे अपने भविष्य के लिए विषय और करियर का चयन करना होता है। दुर्भाग्य से अधिकांश विद्यार्थी अपनी रुचि और क्षमता के बजाय परिवार, रिश्तेदारों या मित्रों की सलाह पर विषय चुन लेते हैं। परिणाम यह होता है कि वर्षों की पढ़ाई के बाद भी वे अपने करियर से संतुष्ट नहीं हो पाते और कई बार अपनी योग्यता के अनुरूप अवसर भी नहीं मिल पाते।
आज देश में बड़ी संख्या में शिक्षित युवा बेरोजगारी या सीमित अवसरों के कारण छोटे-छोटे रोजगार या व्यवसाय करने को विवश हैं। इसमें केवल रोजगार की कमी ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि गलत करियर चयन और कौशल आधारित शिक्षा का अभाव भी एक बड़ा कारण है।
हर माता-पिता अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं, लेकिन केवल महंगे स्कूल या कॉलेज में पढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि बच्चे की वास्तविक रुचि किस क्षेत्र में है। यदि उसकी क्षमता और रुचि के अनुरूप मार्गदर्शन मिले, तो सफलता की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
समाज में लंबे समय तक यह धारणा रही कि बच्चे को उसी पेशे में जाना चाहिए, जिसमें उसके माता-पिता हैं। व्यापारी अपने बच्चे को व्यापारी बनाना चाहते हैं, शिक्षक चाहते हैं कि उनका बच्चा भी शिक्षक बने, जबकि प्रत्येक बच्चे की अपनी अलग प्रतिभा और सोच होती है। आज स्थिति पहले की अपेक्षा बेहतर हुई है और अभिभावक बच्चों की पसंद को भी महत्व देने लगे हैं, लेकिन अभी भी इस दिशा में काफी बदलाव की आवश्यकता है।
किसी भी क्षेत्र में सफलता केवल किताबों से नहीं मिलती। उसके लिए व्यवहारिक अनुभव, कौशल और निरंतर अभ्यास भी जरूरी है। यदि किसी विद्यार्थी को बचपन से ही उसकी रुचि के क्षेत्र का वातावरण मिले, तो वह उस क्षेत्र को बेहतर ढंग से समझ पाता है। उदाहरण के लिए यदि कोई बच्चा कानून के क्षेत्र में जाना चाहता है, तो उसे समय-समय पर न्यायालय या अनुभवी अधिवक्ताओं के संपर्क में लाया जाए। यदि व्यवसाय में रुचि है, तो उसे व्यापार की छोटी-छोटी जिम्मेदारियां दी जाएं। इससे उसके भीतर आत्मविश्वास और व्यावहारिक समझ विकसित होगी।
बच्चों के भविष्य का निर्णय लेने से पहले माता-पिता को उनके व्यवहार, रुचियों और क्षमताओं का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। स्कूल के शिक्षकों और बच्चों के मित्रों से भी चर्चा करनी चाहिए, क्योंकि वे भी बच्चे की प्रतिभा को नजदीक से देखते हैं। इसके बाद ही करियर की दिशा तय करना अधिक उचित होगा।
आज प्रतियोगी परीक्षाओं की होड़ ने भी विद्यार्थियों पर भारी मानसिक दबाव बढ़ा दिया है। बिना अपनी क्षमता और रुचि का मूल्यांकन किए हजारों विद्यार्थी यूपीएससी, नीट, जेईई और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगा देते हैं। सफलता नहीं मिलने पर मानसिक तनाव के साथ परिवार पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है। यदि प्रारंभ से ही कौशल आधारित शिक्षा और सही करियर मार्गदर्शन मिले, तो ऐसी स्थिति काफी हद तक बदली जा सकती है।
भारत की शिक्षा व्यवस्था आज भी काफी हद तक पुस्तकीय ज्ञान पर आधारित है। स्कूलों और कॉलेजों में कौशल आधारित तथा व्यवहारिक शिक्षा को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाया है। यदि प्रारंभिक स्तर से ही स्किल एजुकेशन को प्रभावी रूप से लागू किया जाए, तो विद्यार्थी रोजगार मांगने वाले नहीं, बल्कि रोजगार देने वाले बन सकते हैं।
सरकारी विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना भी समय की आवश्यकता है। शिक्षकों से पढ़ाई के अलावा चुनाव, जनगणना, सर्वे और अन्य प्रशासनिक कार्य कराए जाते हैं, जिससे शिक्षण कार्य प्रभावित होता है। यदि इन कार्यों के लिए अलग व्यवस्था बनाई जाए, तो शिक्षक पूरी क्षमता के साथ विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण में योगदान दे सकेंगे।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम न मानकर व्यक्तित्व विकास, कौशल निर्माण और आत्मनिर्भरता का आधार बनाया जाए। जब बच्चे की रुचि, कौशल और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एक साथ जुड़ेंगे, तभी वह अपने जीवन में सही मायनों में सफल और आत्मनिर्भर बन सकेगा। यही भारत के उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत नींव होगी।
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