चुनाव जीतकर भी Netanyahu के लिए सत्ता दूर, दक्षिणपंथी बिखराव बना बड़ी चुनौती
तेलअवीव। इजराइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं, जहां चुनाव में उनकी पार्टी का अच्छा प्रदर्शन भी उन्हें सत्ता से बाहर कर सकता है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके अपने दक्षिणपंथी गुट से आ रही है, जहां छोटी पार्टियां वोटों का बंटवारा कर रही हैं, जिससे नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के लिए बहुमत का रास्ता मुश्किल हो गया है। इन पार्टियों के कारण न केवल वोट बंटने का खतरा है, बल्कि चुनाव के बाद ये नेतन्याहू की सरकार में शामिल होने से इंकार कर सकती हैं, जिससे उनका भविष्य अधर में लटक गया है। नेतन्याहू लगातार इन छोटी दक्षिणपंथी पार्टियों के समर्थकों से अपनी पार्टी, लिकुड, को वोट देने की अपील कर रहे हैं। उन्हें डर है कि ओफर विंटर और योआज हेंडेल जैसे नेताओं की पार्टियां दक्षिणपंथी वोटों को बिखेर देंगी।
इजराइल में संसद में सीट हासिल करने के लिए किसी पार्टी को कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट प्राप्त करना अनिवार्य है। यदि ये छोटी पार्टियां यह न्यूनतम वोट हासिल नहीं कर पाती हैं, तब उनके सभी वोट व्यर्थ हो जाएंगे, जिससे पूरे दक्षिणपंथी गुट की कुल सीटें कम हो सकती हैं। यह स्थिति नेतन्याहू के लिए सरकार बनाना लगभग असंभव बना देगी। हालांकि, हालिया चुनावी सर्वेक्षणों में विंटर की पार्टी के संसद पहुंचने की संभावना दिख रही है, लेकिन यह तय नहीं है। वोटों के बंटवारे से भी बड़ी समस्या गठबंधन की संभावनाओं में है। ओफर विंटर की पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह नेतन्याहू को प्रधानमंत्री बनाने की सिफारिश कर सकती है, लेकिन उनकी सरकार में शामिल होने के लिए कड़ी शर्तें रखी हैं। विंटर चाहते हैं कि अति-रूढ़िवादी यहूदी पार्टियां सेना में भर्ती से जुड़े कानून पर सहमत हों। यदि ऐसा नहीं होता है, तब उनकी पार्टी ऐसी किसी सरकार का हिस्सा नहीं बनेगी जिसमें इन पार्टियों का दबदबा हो। इसके अलावा, विंटर ने एविगडोर लिबरमैन जैसे विपक्षी नेताओं के साथ सरकार बनाने का विकल्प भी खुला रखा है, जो नेतन्याहू की चिंताएं और बढ़ा रहा है। दूसरी ओर, विपक्षी नेता गादी आइजनकोट अपनी पार्टी को विपक्ष का सबसे बड़ा दल बनाने में जुटे हैं, ताकि प्रधानमंत्री पद के लिए उनका दावा मजबूत हो सके। आइजनकोट नेतन्याहू के कड़े आलोचक हैं। उनका आरोप है कि नेतन्याहू 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रहे हैं और वे जिम्मेदारियों से बचते हैं।
आइजनकोट नेतन्याहू को एंटी-लीडर बताकर कहते हैं कि देश को ऐसी सरकार की जरूरत है जो गलतियों की जिम्मेदारी ले और इजराइल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के करीब लाए। विभिन्न सर्वेक्षणों में भी आइजनकोट को प्रधानमंत्री पद के लिए नेतन्याहू से अधिक उपयुक्त उम्मीदवार बताया गया है। आइजनकोट एक अपरंपरागत रणनीति पर भी विचार कर रहे हैं। बहुमत के बिना भी सरकार बनाना। इजराइल की 120 सीटों वाली संसद में आमतौर पर 61 सीटों का समर्थन चाहिए होता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इससे कम समर्थन के साथ भी सरकार बन सकती है। आइजनकोट ऐसी सरकार बनाने की कोशिश कर सकते हैं, जिसे अरब पार्टियों के मतदान से दूर रहने पर संसद में मंजूरी मिल जाए। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य नेतन्याहू को लंबे समय तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहने से रोकना है, जैसा कि इजराइल ने अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच पांच चुनावों के दौरान देखा था, जब नेतन्याहू कुल 19 महीने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। चुनाव से ठीक पहले इजराइल का राजनीतिक परिदृश्य बेहद अनिश्चित बना हुआ है, जहां नेतन्याहू के सामने सत्ता खोने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है, भले ही उनके मतदाता उन्हें समर्थन देते रहें।
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